विश्व जल दिवस: गहराता जल संकट और अस्तित्व की लड़ाई, क्या हम ‘डे-जीरो’ की ओर बढ़ रहे हैं?

22 मार्च का दिन केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि मानवता के लिए आत्ममंथन का वह क्षण है जहाँ हमें अपनी सबसे मूल्यवान संपदा—जल—के भविष्य पर विचार करना होगा। ‘नीले ग्रह’ के रूप में विख्यात पृथ्वी आज एक ऐसी दहलीज पर खड़ी है जहाँ उसकी नीलिमा संकट में है। विश्व जल दिवस आज औपचारिक आयोजनों से ऊपर उठकर एक वैश्विक चेतावनी बन चुका है। हर साल 22 मार्च को मनाया जाने वाला ‘विश्व जल दिवस’ अब केवल एक कैलेंडर ईवेंट नहीं, बल्कि मानवता के लिए खतरे की घंटी बन चुका है। सभ्यताएं नदियों के किनारे बसी थीं, लेकिन आज वही नदियां और जल स्रोत दम तोड़ रहे हैं।
संकट के मुख्य बिंदु:
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सूखती झीलें और नदियां: मध्य एशिया का अरल सागर लगभग गायब हो चुका है। भारत में बेंगलुरु और दिल्ली जैसे शहरों की झीलें कंक्रीट के नीचे दब गई हैं।
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भूजल का दोहन: भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूजल उपभोक्ता है। नीति आयोग के अनुसार, देश के 21 प्रमुख शहर ‘डे-जीरो’ (शून्य जल स्तर) की कगार पर हैं। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्य ‘डार्क ज़ोन’ में तब्दील हो रहे हैं।
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जनसंख्या का बोझ: 2050 तक दुनिया की आबादी 10 अरब होने का अनुमान है, जिससे पानी की मांग और बढ़ेगी।
सरकारी पहल: भारत सरकार ने ‘जल शक्ति मंत्रालय’ के माध्यम से कई ठोस कदम उठाए हैं। ‘जल जीवन मिशन’ के तहत ग्रामीण इलाकों में नल से जल पहुंचाया जा रहा है। वहीं, ‘अटल भूजल योजना’ और ‘नमामि गंगे’ जैसे प्रोजेक्ट्स जल संरक्षण और नदी सफाई में मील का पत्थर साबित हो रहे हैं।



