असम में हिमंता बिस्वा सरमा युग का विस्तार: दूसरी बार संभाली राज्य की कमान

असम की राजनीति में एक नए अध्याय का सूत्रपात करते हुए हिमंता बिस्वा सरमा ने मंगलवार को लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। गुवाहाटी स्थित कार्यक्रम स्थल पर राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य ने उन्हें संवैधानिक शपथ दिलाई। यह अवसर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरमा अब असम के पहले ऐसे गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बन गए हैं जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद दोबारा इस पद पर वापसी की है।

असम में एनडीए के इस तीसरे सफल कार्यकाल की नींव रविवार को रखी गई थी, जब विधायक दल ने सरमा को अपना निर्विरोध नेता चुना। 2016 में शुरू हुआ भाजपा का यह सफर सर्बानंद सोनोवाल से होता हुआ अब हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में और अधिक सशक्त होकर उभरा है। इस भव्य शपथ ग्रहण समारोह में केंद्र सरकार का शीर्ष नेतृत्व मौजूद रहा, जिसमें प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और रक्षा मंत्री सहित कई राज्यों के वरिष्ठ नेता शामिल थे।

हिमंता बिस्वा सरमा के भाजपा में आगमन को पूर्वोत्तर की राजनीति का ‘टर्निंग पॉइंट’ माना जाता है। 2015 में जब वह कांग्रेस से अलग होकर भाजपा में आए, तब पार्टी की स्थिति राज्य में चुनौतीपूर्ण थी। हालांकि, एनईडीए (NEDA) के संयोजक के रूप में उनकी भूमिका ने क्षेत्रीय समीकरणों को भाजपा के पक्ष में करने में बड़ी भूमिका निभाई। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, आज पूर्वोत्तर में भाजपा का जो विस्तार दिखता है, उसके पीछे सरमा की जमीनी पकड़ और गठबंधन की राजनीति प्रमुख है।

शैक्षणिक रूप से अत्यंत दक्ष मुख्यमंत्री ने अपनी शिक्षा कामरूप अकादमी और कॉटन कॉलेज से प्राप्त की है। कानून की पढ़ाई के बाद उन्होंने गुवाहाटी उच्च न्यायालय में अभ्यास किया और बाद में पीएचडी की उपाधि अर्जित की। उनके शोध का विषय पूर्वोत्तर भारत के विकास में ‘नॉर्थ ईस्टर्न काउंसिल’ की भूमिका पर आधारित था, जो राज्य के प्रति उनकी गहरी समझ को दर्शाता है।

सरमा का सफर 1991-92 में कॉलेज के छात्र संघ महासचिव से शुरू हुआ था, जो बाद में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के माध्यम से सक्रिय राजनीति में बदला। साल 2001 में पहली बार जालुकबारी से विधायक बनने के बाद से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। दो दशकों से अधिक समय से वह इस सीट से लगातार जीत दर्ज कर अपनी लोकप्रियता और राजनीतिक कौशल का परिचय दे रहे हैं।

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