भारत-यूरोप साझेदारी केवल व्यापार तक सीमित नहीं, साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और आपसी विश्वास पर आधारित: पीएम मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को स्वीडन के गोथेनबर्ग में आयोजित ‘यूरोपियन राउंड टेबल फॉर इंडस्ट्री’ (ERT) के एक विशेष सत्र को संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच बढ़ते संबंध महज व्यापारिक और आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये आपसी लोकतांत्रिक सिद्धांतों, विविधता, पारदर्शिता और गहरे विश्वास पर टिके हैं। वोल्वो ग्रुप द्वारा आयोजित इस उच्च स्तरीय संवाद बैठक में स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन के साथ-साथ भारत और यूरोप की प्रमुख कंपनियों के शीर्ष नीति-निर्धारक शामिल हुए।
प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) द्वारा जारी आधिकारिक विवरण के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक परिदृश्य में भारत और यूरोप के बीच प्रगाढ़ होती रणनीतिक साझेदारी के महत्व को विस्तार से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय के जटिल और अनिश्चित अंतरराष्ट्रीय माहौल में एक-दूसरे पर भरोसा करने योग्य विश्वसनीय साझेदारों की भूमिका काफी बढ़ गई है। प्रधानमंत्री ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि प्रतिष्ठित औद्योगिक मंच ईआरटी में शामिल लगभग सभी कॉर्पोरेट प्रमुख किसी न किसी रूप में भारत के विकास पथ और आर्थिक गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। उन्होंने गोथेनबर्ग में इस महत्वपूर्ण विमर्श के आयोजन और आमंत्रण के लिए स्वीडिश प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन के प्रति आभार भी प्रकट किया।
आर्थिक और औद्योगिक सहयोग को एक स्थाई और मजबूत संस्थागत रूप देने के लिए प्रधानमंत्री ने कई अहम प्रस्ताव सामने रखे। उन्होंने सुझाव दिया कि भारत और यूरोप के औद्योगिक संगठनों को अधिक सक्रियता से जोड़ने के लिए हर साल ‘भारत-यूरोप सीईओ राउंड-टेबल’ का आयोजन किया जाना चाहिए, जिसमें विशिष्ट क्षेत्रों के लिए अलग से कार्य समूह (वर्किंग ग्रुप) गठित किए जा सकें। इसके अतिरिक्त, उन्होंने यूरोपीय औद्योगिक मंच के भीतर एक समर्पित ‘इंडिया डेस्क’ स्थापित करने का भी विचार रखा ताकि दोनों पक्षों के व्यापारिक हितों की नियमित और समयबद्ध समीक्षा की जा सके।
विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों की व्यापक संभावनाओं का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि स्वास्थ्य सेवा और जीवन विज्ञान के क्षेत्र में फिलिप्स, नेस्ले और यूनीलिवर जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भारत के साथ पुराना और मजबूत रिश्ता रहा है। अब समय आ गया है कि इस साझेदारी को अगले स्तर पर ले जाया जाए, जिसके तहत वैक्सीन, कैंसर अनुसंधान, डिजिटल हेल्थकेयर, पोषण और मेडिकल उपकरणों के निर्माण में निवेश बढ़ाया जा सके। इसके अलावा उन्होंने टिकाऊ सीमेंट, ग्रीन स्टील, लॉजिस्टिक्स, मोबिलिटी, एयरोस्पेस और रक्षा जैसे क्षेत्रों को वैश्विक स्तर पर उत्कृष्ट परिणाम देने वाले क्षेत्र बताया। तकनीक के मोर्चे पर, उन्होंने एएसएमएल, एनएक्सपी, एसएपी और कैपजेमिनी जैसी दिग्गज कंपनियों का उल्लेख करते हुए वैश्विक तकनीकी नेतृत्वकर्ताओं को भारत के तेजी से बढ़ते एंड-टू-एंड टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम का भागीदार बनने के लिए आमंत्रित किया।
प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की आंतरिक आर्थिक और तकनीकी क्षमताओं की चर्चा करते हुए वैश्विक उद्योग जगत को पांच प्रमुख सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि भारत आज 5जी से 6जी तकनीक की ओर कदम बढ़ाने, एआई-सक्षम नेटवर्क, सुरक्षित कनेक्टिविटी और डिजिटल समावेशन में एक प्रमुख सहयोगी की भूमिका निभा सकता है। ‘डिजिटल इंडिया’ ने सार्वजनिक सेवाओं को अधिक पारदर्शी, कुशल और सुलभ बनाया है और आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है। भारतीय स्टार्टअप्स इस समय फिनटेक, स्पेस, ड्रोन, बायोटेक, क्लाइमेट टेक और मोबिलिटी में वैश्विक स्तर के समाधान तैयार कर रहे हैं, क्योंकि भारत के पास प्रतिभा, पैमाना, मांग और स्थिरता मौजूद है।
घरेलू विनिर्माण और व्यापार सुगमता की दिशा में उठाए गए कदमों का विवरण देते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) सुधारों ने कई नए क्षेत्रों को वैश्विक पूंजी के लिए खोल दिया है। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं ने इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, ऑटो कंपोनेंट्स, सोलर मॉड्यूल, टेलीकॉम और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में विनिर्माण को नई गति दी है। उन्होंने साफ किया कि सरकार केवल ढांचागत और नीतिगत समर्थन के साथ दिशा दे सकती है, जबकि वास्तविक जमीनी बदलाव उद्योग जगत के सामूहिक प्रयासों से ही संभव होगा।
अंतरराष्ट्रीय समझौतों और कनेक्टिविटी पर बात करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ताओं के सफल समापन का स्वागत किया। उन्होंने यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन के उस कथन को दोहराया जिसमें उन्होंने इस ऐतिहासिक समझौते को ‘सभी समझौतों की जननी’ कहा था। उन्होंने इसे एक परिवर्तनकारी आर्थिक कदम बताया, जो सप्लाई चेन को मजबूत करेगा और विनिर्माण तथा सेवाओं में नए अवसर पैदा करेगा। इसके साथ ही, उन्होंने ‘इंडिया मिडिल ईस्ट यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर’ (IMEC) जैसी कनेक्टिविटी परियोजनाओं को द्विपक्षीय व्यापार के लिए एक नया मील का पत्थर करार दिया। अंत में, उन्होंने “डिजाइन फॉर इंडिया, मेक इन इंडिया और एक्सपोर्ट फ्रॉम इंडिया” के दृष्टिकोण को दोहराते हुए यूरोपीय कंपनियों को भारत में एक भरोसेमंद आर्थिक साझेदार के रूप में निवेश और सहभागिता बढ़ाने का निमंत्रण दिया।



