अंतरराष्ट्रीय बाजार में चमकेगी लद्दाख की खुबानी, पहली बार यूएई भेजी गई 5 मीट्रिक टन की खेप

देश के कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सफलता अर्जित की गई है, जिसके तहत लद्दाख से पहली बार 5 मीट्रिक टन प्रमाणित जैविक खुबानी की खेप संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) निर्यात की गई है। इस उपलब्धि पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इसे वैश्विक बाजार में भारतीय जैविक खाद्य पदार्थों की बढ़ती लोकप्रियता का एक अनुपम उदाहरण बताया।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के रणनीतिक सहयोग से देश के विभिन्न राज्यों के किसानों को अब वैश्विक स्तर पर अपनी उपज बेचने के सीधे अवसर मिल रहे हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि लद्दाख की जैविक खुबानी का यह निर्यात जैविक कृषि को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले किसानों की आय को बढ़ाने और उनके लिए सतत आजीविका सुनिश्चित करने में मील का पत्थर साबित होगा।
कृषि उत्पादों के विदेशी व्यापार को विस्तार देने की एपीडा की यह मुहिम केवल लद्दाख तक सीमित नहीं है। हाल ही में इस संस्था के मार्गदर्शन में झारखंड के सुदूर आदिवासी क्षेत्रों की महिला किसान उत्पादक कंपनियों (एफपीओ) से जुड़े किसानों द्वारा उगाए गए 2 मीट्रिक टन आम्रपाली आम की खेप को दुबई निर्यात करने में सफलता मिली थी।
इस अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक पहल के परिणामस्वरूप झारखंड की महिला किसानों को अपनी उपज का असाधारण रिटर्न मिला, जो स्थानीय बाजार दरों से लगभग 180 प्रतिशत अधिक था। इस मुनाफे ने ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित महिला उद्यमों को एक नई दिशा दी है।
इससे पहले, एपीडा ने जम्मू-कश्मीर के फल उत्पादकों को भी वैश्विक खरीदारों से जोड़ने का काम किया था, जहां से प्रीमियम ‘अरेको चेरी’ और ‘सेंसेट्रोस प्लम’ की शुरुआती खेप संयुक्त अरब अमीरात भेजी गई थी। घाटी के शोपियां और पुलवामा जिलों से जुटाई गई करीब 1 मीट्रिक टन उच्च गुणवत्ता वाले फलों की इस खेप ने सिद्ध किया कि जम्मू-कश्मीर के बागवानी उत्पादों में भारी निर्यात क्षमता मौजूद है।
लद्दाख से शुरू हुआ जैविक खुबानी का यह नया निर्यात अभियान देश के पर्वतीय क्षेत्रों के कृषि परिदृश्य में बड़ा बदलाव ला सकता है। इससे न केवल लद्दाखी खुबानी को वैश्विक पहचान मिलेगी, बल्कि आने वाले समय में सीमांत क्षेत्रों के कृषकों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी।



