आईएनएस ‘मालवन’ नौसेना में शामिल: उथले पानी में दुश्मनों की पनडुब्बियों पर नकेल कसेगा स्वदेशी युद्धपोत

भारतीय नौसेना ने करवार में आयोजित एक औपचारिक समारोह के दौरान माहे श्रेणी के दूसरे ‘एंटी सबमरीन वॉरफेयर शेलो वाटर क्राफ्ट’ (एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी) आईएनएस ‘मालवन’ को अपने बेड़े में शामिल कर लिया है। पूर्ण रूप से देश में ही डिजाइन और निर्मित यह पोत उथले समुद्री इलाकों में दुश्मन की पनडुब्बियों की पहचान कर उन्हें नष्ट करने में सक्षम है। इसके आने से भारतीय नौसेना की तटीय सुरक्षा और पनडुब्बी रोधी क्षमताओं में गुणात्मक वृद्धि होगी।

नौसेना अधिकारियों के अनुसार, आईएनएस ‘मालवन’ को विशेष रूप से उथले जल क्षेत्रों में नौसैनिक अभियानों को अंजाम देने के लिए तैयार किया गया है। यह पोत बड़े युद्धपोतों, पनडुब्बियों और नौसैनिक विमानों के साथ रणनीतिक तालमेल बिठाकर काम कर सकता है। इसकी तैनाती के बाद से समुद्री सीमाओं की चौकसी और पनडुब्बी रोधी अभियानों के संचालन में नौसेना को बड़ी बढ़त हासिल होगी।

यह युद्धपोत ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल की सफलता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, क्योंकि इसके निर्माण में 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री और प्रणालियों का इस्तेमाल किया गया है। माहे श्रेणी के इस दूसरे युद्धपोत का बेड़े में शामिल होना देश की नौसैनिक डिजाइनिंग, उपकरण निर्माण और उन्नत प्रणालियों के एकीकरण की क्षमता को प्रमाणित करता है।

आईएनएस ‘मालवन’ का प्रतीक चिह्न ऐतिहासिक ‘बाघ नख’ से प्रेरित है, जो वीरता, फुर्ती और सटीक हमले का प्रतिनिधित्व करता है। इसके ध्येय वाक्य ‘साइलेंट क्लॉज’ का अर्थ इसकी गुप्त और घातक प्रहार क्षमता से है। इस नए युद्धपोत का नाम नौसेना के पूर्व माइंसवीपर पोत ‘मालवन’ की याद में रखा गया है, जिसे 19 साल की राष्ट्र सेवा के बाद वर्ष 2003 में सेवामुक्त कर दिया गया था।

कमीशनिंग समारोह की अध्यक्षता वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने की। कार्यक्रम में पश्चिमी नौसैनिक कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल संजय वात्सायन, कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड के अधिकारी और नौसेना के पूर्व व वर्तमान सैन्य अधिकारी मौजूद रहे।

समारोह को संबोधित करते हुए एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने कहा कि मौजूदा वैश्विक अनिश्चितता के दौर में भारत के आर्थिक विकास के लिए समुद्री व्यापार मार्गों को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है। उन्होंने पोत निर्माण में नौसेना की सीधी भूमिका को रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण का एक सफल मॉडल बताया और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए तीनों सेनाओं के बीच बेहतर संयुक्त तालमेल की आवश्यकता पर बल दिया।

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