एशियाई खेल: चीन की मुक्केबाज को हराकर लवलीना बोरगोहेन ने जीता पहला एशियाई स्वर्ण, 12 वर्ष का इंतजार खत्म

भारत की शीर्ष मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन ने शुक्रवार को शानदार प्रदर्शन करते हुए एशियाई खेलों में अपना पहला स्वर्ण पदक जीत लिया। उन्होंने अपने जन्मदिन के अवसर पर महिलाओं के 75 किलोग्राम भार वर्ग के खिताबी मुकाबले में चीन की ज़ियी बाओ को 5-0 से मात दी। इस खिताबी जीत के साथ लवलीना ने न केवल पिछले एशियाई खेलों के अपने रजत पदक को स्वर्ण में बदला, बल्कि भारतीय महिला मुक्केबाजी में 12 साल से चले आ रहे स्वर्ण पदक के इंतजार को भी खत्म कर दिया।

तोक्यो ओलंपिक की पदक विजेता लवलीना ने पेरिस ओलंपिक के बाद खेल से हटने की योजना बनाई थी। पेरिस में पोडियम तक न पहुंच पाने की कमी ने उन्हें रिंग में डटे रहने के लिए प्रेरित किया। उनका यह फैसला अंततः सही साबित हुआ और उन्होंने महाद्वीपीय स्तर पर देश का परचम लहराया।

जीत दर्ज करने के बाद लवलीना ने खुलासा किया कि पिछला साल उनके लिए मानसिक और शारीरिक रूप से बेहद कठिन था। एक समय वे मुक्केबाजी को पूरी तरह त्यागने पर विचार कर रही थीं, लेकिन उन्होंने खुद को संभाला। लवलीना ने कहा कि एशियाई खेलों में अपने पदक को स्वर्ण में बदलना उनके लिए बहुत जरूरी था, परंतु खेल को न छोड़ते हुए आगे बढ़ना उनके लिए उससे भी बड़ा कदम था।

असम की इस मुक्केबाज को पेरिस ओलंपिक के बाद करीब एक साल का विश्राम लेना पड़ा था। इसके बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में वापसी की, जहां राष्ट्रमंडल खेलों में वे स्वर्ण से चूककर रजत पदक ही हासिल कर सकी थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे उस परिणाम से प्रसन्न नहीं थीं, लेकिन खिलाड़ी के सफर में आने वाली चोटों और पराजयों को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ना होता है, इसलिए यह नई उपलब्धि उनके लिए विशेष महत्व रखती है।

29 साल की लवलीना ने सकारात्मक मानसिकता को अपनी ताकत बताया और कहा कि वे हमेशा रिंग में जीत के लक्ष्य के साथ उतरती हैं। जीत के जश्न को लेकर उन्होंने कहा कि वे अभी इस सुखद अहसास को समझने की कोशिश कर रही हैं। अपनी खुशी बांटने के संदर्भ में उन्होंने बताया कि वे सबसे पहले अपनी मां को फोन लगाएंगी, जो अत्यधिक घबराहट और चिंता के कारण कभी उनका मैच नहीं देखती हैं।

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