पीएम मोदी ने पेट्रोलियम और बिजली क्षेत्र की समीक्षा की; पश्चिम एशिया संकट पर सरकार की पैनी नजर

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को देश की ऊर्जा स्थिति की समीक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य पेट्रोलियम, कच्चे तेल, गैस और उर्वरक जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करना था।

प्रधानमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाले किसी भी उतार-चढ़ाव का असर भारतीय उपभोक्ताओं और उद्योगों पर न पड़ने पाए। बैठक में विशेष रूप से ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ जैसे प्रमुख समुद्री मार्गों में संभावित व्यवधानों पर चिंता जताई गई। इसे देखते हुए सरकार ने अपनी आयात रणनीति में विविधता लाते हुए अब खाड़ी देशों के बाहर (जैसे अमेरिका, रूस और नाइजीरिया) से 70% तेल आयात करना शुरू कर दिया है। साथ ही, एलपीजी की कमी को पूरा करने के लिए अमेरिका से अतिरिक्त खरीद की योजना पर भी चर्चा हुई। पीएम ने स्पष्ट किया कि शांति और सुरक्षित समुद्री मार्ग वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक व्यापक समीक्षा बैठक के माध्यम से देश के ऊर्जा ढांचे की मजबूती का आकलन किया। इस बैठक में पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, बिजली और उर्वरक मंत्रालयों के शीर्ष अधिकारी शामिल हुए। बैठक का मुख्य एजेंडा “निर्बाध आपूर्ति और स्थिर लॉजिस्टिक्स” रहा।

बैठक के मुख्य निष्कर्ष:

  1. क्षेत्रीय अस्थिरता और प्रभाव: पश्चिम एशिया, जो तेल और गैस का वैश्विक केंद्र है, वहां जारी संघर्ष के कारण ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस क्षेत्र पर काफी हद तक निर्भर रहा है, इसलिए सुरक्षा उपायों की समीक्षा अनिवार्य थी।

  2. वैकल्पिक स्रोत: भारत ने अपनी आयात नीति में बड़ा बदलाव किया है। नाइजीरिया और अमेरिका जैसे देशों से बढ़ते आयात ने खाड़ी संकट के प्रभाव को कम करने में मदद की है।

  3. बुनियादी ढांचा और बिजली: बैठक में केवल तेल ही नहीं, बल्कि बिजली उत्पादन और उर्वरक उत्पादन के लिए आवश्यक इनपुट की उपलब्धता पर भी चर्चा हुई, ताकि कृषि और औद्योगिक विकास की गति धीमी न पड़े।

  4. वैश्विक सहयोग: प्रधानमंत्री ने वैश्विक मंचों पर भी समुद्री मार्गों को सुरक्षित रखने की आवश्यकता को रेखांकित किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत इस संकट के समाधान के लिए कूटनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर सक्रिय है।

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