चोल साम्राज्य की प्राचीन ताम्र पट्टिकाएं नीदरलैंड से भारत लौटीं, प्रधानमंत्री ने ‘ज्ञान भारतम् अभियान’ की सफलताओं को भी सराहा

नीदरलैंड के विशेष राजकीय समारोह में भारत को वापस सौंपे गए 11वीं सदी के चोलकालीन ताम्र-पत्रों की देश वापसी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को प्रसन्नता व्यक्त की। आकाशवाणी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम के माध्यम से राष्ट्र को संबोधित करते हुए उन्होंने बताया कि तमिल भाषा में लिखित इन ऐतिहासिक धरोहरों में 21 बड़ी और 3 छोटी पट्टिकाएं शामिल हैं। उन्होंने इसे देश के सांस्कृतिक इतिहास के लिए एक अत्यंत गौरवशाली अवसर करार दिया।
प्रधानमंत्री ने अपने हालिया विदेश दौरे का विवरण साझा करते हुए कहा कि यूरोप यात्रा के दौरान नीदरलैंड में कई उच्च स्तरीय बैठकें हुईं। इसी प्रवास के मध्य आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में वहां के प्रधानमंत्री की मौजूदगी में चोल काल के इन प्राचीन अभिलेखों को भारत को ससम्मान वापस किया गया, जिसने पूरे देश को गौरवान्वित किया है। इस ऐतिहासिक कदम की सराहना करते हुए देश-विदेश में रह रहे भारतीय और विशेषकर दुनिया भर के तमिल नागरिक अपनी प्रसन्नता और उत्साह प्रकट कर रहे हैं।
इन ताम्र-पत्रों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए प्रधानमंत्री ने जनसाधारण से जुड़ी जानकारियों को साझा किया। उन्होंने बताया कि यह दस्तावेज मुख्य रूप से चोल शासक राजेंद्र चोल-प्रथम से संबंधित हैं, जिन्होंने अपने पिता राजा राजराजा चोल के दिए गए एक वचन को पूरा करने हेतु इन्हें तैयार करवाया था। इन पत्रों में आनइमंगलम् गांव को एक बौद्ध विहार के संचालन के लिए दान स्वरूप देने का ऐतिहासिक साक्ष्य दर्ज है। साथ ही, इनमें तत्कालीन चोल वंश के पराक्रम, उनकी मजबूत समुद्री सैन्य क्षमता और दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों के साथ स्थापित संबंधों का विस्तृत विवरण मिलता है।
देश की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरों के पुनरुद्धार और उनके संरक्षण की दिशा में सरकारी प्रयासों को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि पूर्वजों का समृद्ध इतिहास हमारी पहचान है। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने देश के भीतर चल रहे ‘ज्ञान भारतम् अभियान’ की एक और बड़ी सफलता का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ के मल्हार क्षेत्र में पुरातात्विक अन्वेषण के दौरान तीन अत्यंत दुर्लभ ताम्र पट्टिकाएं खोजी गई हैं, जिनका संबंध पांडुवंशी राजवंश के शासक महर्षि बालार्जुन के शासनकाल से है।
इस नई खोज के ऐतिहासिक महत्व को समझाते हुए उन्होंने कहा कि पुरातत्वविदों के मुताबिक ये शिलालेख तकरीबन छठी से सातवीं सदी के हैं, जो करीब चौदह सौ से पंद्रह सौ वर्ष पुराने इतिहास को समेटे हुए हैं। प्राचीन पाली भाषा और ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण ये ताम्र पट्टिकाएं उस सुदूर अतीत की शासकीय कार्यप्रणाली, समकालीन धर्म और तत्कालीन समाज की सांस्कृतिक चेतना पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालती हैं।



