भारतीय नौसेना में शामिल हुए दो अत्याधुनिक स्वदेशी युद्धपोत, समुद्री सुरक्षा और रक्षा तैयारियों को मिलेगी नई ताकत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में उन्नत तकनीकों से लैस स्टेल्थ फ्रिगेट ‘आईएनएस दूनागिरी’ और पनडुब्बी रोधी युद्धपोत ‘आईएनएस अग्रय’ को भारतीय नौसेना के बेड़े में औपचारिक रूप से शामिल किया। आधुनिक समुद्री मोर्चों पर देश की सामरिक क्षमताओं को बढ़ाने के उद्देश्य से इन दोनों युद्धपोतों का निर्माण स्वदेशी तकनीक से किया गया है। जहां एक तरफ दूनागिरी रडार की नजरों से बचकर अचूक हमला करने में माहिर है, वहीं अग्रय समुद्र के भीतर छिपे खतरों को खोजकर उन्हें खत्म करने की विशेष क्षमता रखता है। इन दोनों प्लेटफॉर्म्स के आने से नौसेना की पानी के अंदर मार करने की क्षमता और असममित युद्ध (एसिमेट्रिक वारफेयर) की तैयारियों को अत्यधिक मजबूती मिलेगी।

सैन्य विश्लेषकों के अनुसार, आधुनिक युग में युद्ध का स्वरूप तकनीकी विकास के कारण पूरी तरह बदल चुका है। वर्तमान समय में महज कुछ लाख रुपयों की लागत वाले ड्रोन भी हजारों करोड़ रुपये के विशाल सैन्य तंत्र को भारी क्षति पहुंचा सकते हैं। इसी प्रकार की समकालीन सुरक्षा चुनौतियों का दृढ़ता से मुकाबला करने के लिए भारतीय नौसेना अपने बेड़े में लगातार स्वदेशी और उन्नत तकनीक से सुसज्जित जहाजों का समावेश कर रही है।

विशेष बात यह है कि नौसेना में शामिल किए गए इन दोनों जहाजों के नाम भारतीय सांस्कृतिक और पौराणिक धरोहर से प्रेरित हैं। उन्नत स्टेल्थ फ्रिगेट दूनागिरी का नामकरण हिमालय की द्रोणागिरी पर्वत श्रृंखला के आधार पर किया गया है। वहीं, उथले पानी में पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए बने आईएनएस अग्रय का प्रतीक चिह्न (इंसिग्निया) महाभारत काल के महान धनुर्धर अर्जुन के सुप्रसिद्ध ‘गांडीव’ धनुष से लिया गया है।

आईएनएस दूनागिरी मुख्य रूप से प्रोजेक्ट 17ए के तहत विकसित किया गया एक गाइडेड मिसाइल स्टेल्थ फ्रिगेट है। इससे पहले, 30 मार्च 2026 को इसके निर्माता गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) ने इसे आधिकारिक तौर पर नौसेना को सुपुर्द किया था। यह पांचवां फ्रिगेट ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल प्रणाली से लैस है, जो जल, नभ और उप-सतह (सबमरीन) तीनों क्षेत्रों से आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार किया गया है।

इस गौरवपूर्ण अवसर पर युद्धपोत के कमिशनिंग कमांडिंग ऑफिसर, कैप्टन दिव्य आलोक ने अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा, “इस विशिष्ट युद्धपोत का पहला कमांडिंग ऑफिसर नियुक्त होना मेरे लिए अत्यंत गौरव का विषय है। दूनागिरी का नाम द्रोणागिरी पर्वत से प्रेरित है। जिस प्रकार पौराणिक काल में संकट के समय लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा के लिए पवनपुत्र हनुमान पूरा पर्वत उठा लाए थे, ठीक उसी प्रकार का अटूट जज्बा और समर्पण हमारे पूरे क्रू में समाहित है।”

कैप्टन दिव्य आलोक ने जहाज की तकनीकी विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए आगे बताया कि इस फ्रिगेट को बहुत ही कम रडार क्रॉस-सेक्शन के साथ विशेष रूप से डिजाइन किया गया है, जिसकी वजह से दुश्मन के रडार के लिए इसकी टोह लेना बेहद मुश्किल हो जाता है। यह पोत उन्नत सेंसर, कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम और एकीकृत हथियार प्रणालियों से परिपूर्ण है। इसके भीतर लगा कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम सभी सेंसरों से प्राप्त डेटा का त्वरित विश्लेषण करता है, जिससे आपातकालीन स्थिति में जवाबी कार्रवाई का समय काफी कम हो जाता है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की बात करें तो यह नया युद्धपोत पुराने आईएनएस दूनागिरी का ही एक पुनर्जन्म और आधुनिक रूप है। पुराना जहाज लींडर क्लास का फ्रिगेट था, जिसने 5 मई 1977 से लेकर 10 अक्टूबर 2010 तक देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा की थी। प्रोजेक्ट 17ए के अंतर्गत कुल सात नीलगिरी क्लास फ्रिगेट का निर्माण किया जा रहा है। इस श्रृंखला का प्रथम पोत आईएनएस नीलगिरी जनवरी 2025 में नौसेना का हिस्सा बना था, जिसके बाद हिमगिरी और उदयगिरी को शामिल किया गया। मार्च 2026 में तारागिरी को बेड़े में जगह मिली और अब जून में दूनागिरी को शामिल कर लिया गया है। इन जहाजों में स्थापित ब्रह्मोस प्रणाली इन्हें सतह विरोधी और पोत विरोधी युद्ध में घातक बनाती है।

यह युद्धपोत बराक-8 लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल, अत्याधुनिक एयर डिफेंस गन, स्वदेशी तौर पर विकसित ‘वरुणास्त्र’ टॉरपीडो, पनडुब्बी रोधी रॉकेट लॉन्चर, उन्नत सोनार और मल्टी-फंक्शन रडार जैसे सुरक्षा तंत्र से पूरी तरह सुसज्जित है। लगभग 6,700 टन वजनी यह विशाल पोत अधिकतम 30 नॉट की तीव्र गति से चलने में सक्षम है और इसके निर्माण में तकरीबन 75 प्रतिशत उपकरण पूरी तरह स्वदेशी हैं, जिसका खाका नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया है।

इसके समानांतर, भारतीय नौसेना में शामिल हुआ एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट ‘अग्रय’ भी मारक क्षमताओं के मामले में बेजोड़ है। इसके अद्वितीय प्रदर्शन को देखते हुए ही इसका प्रतीक चिन्ह अर्जुन का गांडीव रखा गया है। युद्धपोत के प्रथम कमांडिंग ऑफिसर, कमांडर सुनील मल्होत्रा ने पोत की महत्ता बताते हुए स्पष्ट किया कि भले ही यह जहाज आकार में छोटा प्रतीत होता हो, परंतु यह आधुनिक हथियारों और उन्नत सेंसरों का एक अत्यंत विनाशकारी संयोजन है।

कमांडर मल्होत्रा ने विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि यह पोत समुद्र के छिपे हुए कोनों में दुश्मन की पनडुब्बियों पर सटीक प्रहार करने और सतह पर होने वाले असममित युद्ध की चुनौतियों को नाकाम करने के लिए पूरी तरह तैयार है। इसके रक्षात्मक बेड़े में स्वदेशी सोनार, अत्याधुनिक रॉकेट लॉन्चर और टॉरपीडो ट्यूब लगाए गए हैं। साथ ही, दुश्मन के टॉरपीडो को हवा में ही निष्प्रभावी करने के लिए उन्नत डिकॉय सिस्टम और सुरक्षा हेतु स्टेबलाइज्ड रिमोट-कंट्रोल्ड गन की व्यवस्था भी की गई है।

कमांडर सुनील मल्होत्रा ने आगे साझा किया, “इस जहाज के माध्यम से हमारा संदेश पूरी तरह स्पष्ट है। अर्जुन का गांडीव सदैव अचूक निशाने के लिए जाना जाता था, और हम भी यही उम्मीद करते हैं कि युद्ध के मैदान में यह युद्धपोत कभी भी अपना लक्ष्य नहीं चूकेगा।” नौसेना ने समुद्र में दुश्मन की पनडुब्बियों की खोज और उनके दमन के लिए एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट परियोजना की नींव रखी थी। वर्ष 2019 में इस परियोजना के तहत 16 युद्धपोतों के निर्माण का अनुबंध किया गया था, जिसमें से आठ का निर्माण कोचीन शिपयार्ड और आठ का निर्माण जीआरएसई में चल रहा है।

इस परियोजना के अंतर्गत अग्रय से पूर्व आईएनएस अर्णाला, आईएनएस अंद्रोत्त, आईएनएस माहे और आईएनएस अंजदीप जैसे जहाजों को पहले ही भारतीय नौसेना के बेड़े का हिस्सा बनाया जा चुका है। आईएनएस अग्रय की तकनीकी विशिष्टताओं की बात करें तो यह पनडुब्बी रोधी रॉकेट लॉन्चर, हल्के वजन के टॉरपीडो, 30 मिमी की नेवल गन, हल-माउंटेड सोनार और वेरिएबल डेप्थ सोनार जैसी प्रणालियों से लैस है। यह क्राफ्ट 25 नॉट की गति से चलने में सक्षम है और इसकी परिचालन दूरी लगभग 3,300 किलोमीटर तक है। तटीय समुद्री इलाकों में यह पोत 100 से 150 नॉटिकल मील के दायरे में दुश्मन की पनडुब्बियों की गतिविधि का आसानी से पता लगा सकता है।

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