वैश्विक सेमीकंडक्टर हब बनने की ओर भारत: तीन इकाइयों में उत्पादन शुरू, ‘सेमीकॉन 2.0’ से मजबूत होगा पूरा इकोसिस्टम

केंद्रीय रेल, सूचना एवं प्रसारण तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने देश के सेमीकंडक्टर रोडमैप की प्रगति साझा करते हुए स्पष्ट किया है कि भारत केवल विनिर्माण संयंत्रों तक सीमित न रहकर एक संपूर्ण और आत्मनिर्भर सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तैयार कर रहा है। वर्ष 2021 में शुरू किए गए 10 अरब डॉलर के ‘सेमीकॉन इंडिया’ कार्यक्रम के तहत अब तक स्वीकृत 12 परियोजनाओं में से तीन प्रमुख इकाइयों ने वर्ष 2026 में अपना व्यावसायिक उत्पादन भी शुरू कर दिया है। सरकार की रणनीति चिप डिजाइन, फैब्रिकेशन, पैकेजिंग, उपकरण निर्माण, रासायनिक सामग्री और प्रतिभा विकास को एक साथ जोड़कर भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के केंद्र में स्थापित करने की है।
आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में सेमीकंडक्टर बुनियादी रीढ़ बन चुके हैं। करीब 4.3 ट्रिलियन डॉलर के तेजी से बढ़ते वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में ऑटोमोबाइल, विमानन, ड्रोन, स्मार्टफोन से लेकर एमआरआई मशीनों तक की कार्यप्रणाली सूक्ष्म चिप्स पर टिकी है। तकनीकी जटिलता का उल्लेख करते हुए केंद्रीय मंत्री ने 3-नैनोमीटर प्रक्रिया पर बने एप्पल के A19 बायोनिक चिप का उदाहरण दिया, जिसमें लगभग 30 अरब ट्रांजिस्टर समाहित हैं। कोरोना महामारी के दौरान वैश्विक स्तर पर चिप आपूर्ति बाधित होने के बाद सभी प्रमुख देशों ने घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया, जिसके बाद भारत ने भी अपनी पूर्व-निर्मित इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण क्षमता के दम पर इस दिशा में निर्णायक कदम उठाए।
भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण के प्रयास करीब छह दशक पुराने हैं। वर्ष 1960 में फेयरचाइल्ड सेमीकंडक्टर ने भारत में संभावनाएं तलाशी थीं, लेकिन तत्कालीन आर्थिक नीतियों और उत्पादन कोटा प्रणाली के चलते योजना आगे नहीं बढ़ सकी। वहीं वर्ष 2010 के दशक की शुरुआत में भी नीतिगत तालमेल की कमी के कारण उपकरण सीमा शुल्क से ही वापस लौटा दिए गए थे। इसके विपरीत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘मेक इन इंडिया’, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई), और कराधान सुधारों के माध्यम से पहले इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण की सुदृढ़ नींव तैयार की गई। आज देश में 300 से अधिक इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण इकाइयां कार्यरत हैं। इस क्षेत्र का उत्पादन मूल्य 130 अरब डॉलर और निर्यात 48 अरब डॉलर के पार पहुंच चुका है, जिसमें मोबाइल फोन निर्यात ने पेट्रोलियम व आभूषणों को पीछे छोड़ दिया है और करीब 25 लाख लोगों को रोजगार मिला है।
वर्ष 2021 में शुरू हुए सेमीकॉन कार्यक्रम के अंतर्गत स्वीकृत 12 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं में कुल 20 अरब डॉलर का निवेश प्रस्तावित है। इनमें से तीन संयंत्रों ने वाणिज्यिक उत्पादन आरंभ कर दिया है, जिनमें माइक्रोन ने 28 फरवरी 2026, केन्स ने 31 मार्च 2026 और सीजी पावर ने 4 जुलाई 2026 से उत्पादन शुरू किया। इसके अतिरिक्त, वैश्विक कंपनियों ने इस कार्यक्रम से इतर भी 3 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है। डिजाइन क्षेत्र में 10 वर्षों में 85,000 कुशल इंजीनियर तैयार करने के लक्ष्य के साथ ‘चिप्स टू स्टार्टअप’ के तहत 320 से अधिक विश्वविद्यालयों व स्टार्टअप्स को इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन (ईडीए) टूल दिए गए, जिनकी मदद से छात्रों द्वारा तैयार 40 चिप्स प्रधानमंत्री के समक्ष प्रदर्शित की गईं। डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव (डीएलआई) के तहत 105 स्टार्टअप्स को सहायता दी गई, जिनमें से 24 को 83 मिलियन डॉलर की मदद मिली और 15 स्टार्टअप्स ने 118.5 मिलियन डॉलर की वेंचर कैपिटल फंडिंग जुटाई।
भविष्य की जरूरतों को देखते हुए सरकार ने ‘सेमीकॉन 2.0’ की रूपरेखा तैयार की है, जो सात प्रमुख स्तंभों पर आधारित होगी। इसके तहत चिप डिजाइन के छह प्रमुख घटकों—कंप्यूट, मेमोरी, आरएफ, पावर, नेटवर्किंग और सेंसर—पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। साथ ही, चिप निर्माण में लगने वाली जटिल मशीनों और 150 से 500 प्रकार के विशेष रसायनों व गैसों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा। वर्तमान में विकसित हो रहे दो फैब के अलावा नए फैब स्थापित करने, उन्नत पैकेजिंग तकनीकों को अपनाने और 1 लाख नए डिजाइन इंजीनियरों को प्रशिक्षित करने की योजना है। तकनीकी स्तर पर, मौजूदा 40-नैनोमीटर क्षमता से आगे बढ़कर अगले आठ वर्षों में 7-नैनोमीटर से 3-नैनोमीटर के एडवांस्ड नोड्स तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है। अपेक्षाकृत मैच्योर तकनीक से शुरुआत करने के सवालों पर केंद्रीय मंत्री ने स्पष्ट किया कि जैसे नए पौधे को फल देने योग्य पेड़ बनने तक संरक्षण और पोषण की आवश्यकता होती है, उसी तरह नवोदित भारतीय सेमीकंडक्टर उद्योग को भी चरणबद्ध विकास और सरकारी सहयोग से ही वैश्विक प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है।



