इस साल के अंत तक अमल में आ सकता है भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता: जैस्पर विक

भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को इसी साल के अंत तक अंतिम रूप दिए जाने की प्रबल संभावना है। राष्ट्रीय राजधानी में बुधवार को एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान भारत में जर्मनी के राजदूत जैस्पर विक ने यह बयान दिया। उन्होंने कहा कि समझौते के तहत उपलब्ध आर्थिक अवसरों को वास्तविक रूप देना तथा दोनों पक्षों के बीच व्यापार व पूंजी निवेश को बढ़ावा देना उनके प्रमुख लक्ष्यों में शामिल रहेगा।
राजदूत ने वार्ता की प्रगति का ब्योरा देते हुए कहा कि समझौते से जुड़ी औपचारिक बातचीत इस वर्ष के आरंभ में ही पूरी हो चुकी है, जिसके बाद अब साल खत्म होने से पहले इस पर आधिकारिक मुहर लगने की उम्मीद है। विक ने उल्लेख किया कि उनकी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करने की रहेगी कि भारतीय व जर्मन उद्योग जगत इस ऐतिहासिक समझौते से मिलने वाले आर्थिक लाभों का अधिकतम दोहन कर सकें।
व्यापारिक संभावनाओं को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह समझौता द्विपक्षीय वाणिज्य को भारी मजबूती प्रदान करेगा, जिससे दोनों पक्षों के मध्य कुल व्यापार बढ़कर दोगुना तक पहुंच सकता है।
व्यापक कूटनीतिक संदर्भों का जिक्र करते हुए राजदूत विक ने बताया कि सन 2000 में स्थापित भारत और जर्मनी की रणनीतिक साझेदारी मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में बेहद अहम मोड़ पर है। वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ी है, राष्ट्रों के बीच भरोसा घट रहा है और महाशक्तियों के बीच टकराव में वृद्धि देखी जा रही है। ऐसे जटिल समय में भरोसेमंद और स्थिर साझेदारियों की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है।
उन्होंने आगे कहा कि अंतरराष्ट्रीय सामरिक वातावरण में आई गिरावट के दौर में आपसी समझ और गहरे विश्वास पर आधारित रिश्ते ही स्थिरता दे सकते हैं। भारत और जर्मनी समान सिद्धांतों और दृष्टिकोण को साझा करते हैं, जिससे नई वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए दोनों राष्ट्रों का एकजुट सहयोग अत्यंत निर्णायक सिद्ध होगा।
इसके अलावा, रियायती रूसी कच्चे तेल के आयात पर भारत के खिलाफ संभावित अमेरिकी कार्रवाई के सवाल पर जर्मन राजदूत ने आईएएनएस से स्थिति साफ की। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका की तरफ से भारत पर न तो कोई दंडात्मक शुल्क लगाया गया है और न ही कोई पाबंदी लागू की गई है। अमेरिकी कांग्रेस द्वारा केवल राष्ट्रपति को अपने विवेकानुसार निर्णय लेने की मंजूरी दी गई है, लिहाजा वर्तमान तक इस मामले में कोई औपचारिक फैसला नहीं हुआ है।



