क्वांटम तकनीक में आत्मनिर्भरता की ओर भारत: 10 नई प्रौद्योगिकियों और 9 नए स्टार्टअप्स की शुरुआत के साथ मिशन ने पकड़ी गति

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित ‘प्रगति क्यू-फाउंड्री 2026’ में घोषणा की कि भारत ने अपने आठ वर्षीय लक्ष्य का आधा हिस्सा मात्र तीन साल में पूरा करते हुए 1,000 किलोमीटर सुरक्षित संचार ढांचा तैयार कर लिया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश में प्रतिभा और उद्योग की तैयारी का मजबूत संगम है, जिसे सरकार का नीतिगत समर्थन वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बना रहा है।
डॉ. आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र में संपन्न इस साझेदारी बैठक में डॉ. सिंह ने स्पष्ट किया कि भारत संपूर्ण क्वांटम मूल्य श्रृंखला में घरेलू क्षमताओं के विस्तार पर केंद्रित है। राष्ट्रीय क्वांटम मिशन वैज्ञानिक संस्थानों, निवेशकों, उद्योगों और राज्यों को एक मंच पर लाने का कार्य कर रहा है, ताकि देश रणनीतिक व महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए आवश्यक हार्डवेयर, प्रोसेसर और सेंसर खुद तैयार कर सके।
कार्यक्रम में 9 अतिरिक्त उद्यमों को शामिल किए जाने से मिशन के तहत समर्थित स्टार्टअप्स का आंकड़ा 26 पर पहुंच गया है। इसके अलावा 10 आधुनिक तकनीकों और रणनीतिक समझौता ज्ञापनों की भी शुरुआत की गई। व्यावहारिक प्रदर्शन के रूप में चेन्नई और बेंगलुरु के बीच बीएसएनएल फाइबर अवसंरचना और 17 सुरक्षित नोड्स का उपयोग करके हाइब्रिड पीक्यूसी-क्यूकेडी लिंक की कार्यप्रणाली सिद्ध की गई, जो सुरक्षित डेटा ट्रांसमिशन के क्षेत्र में एक ठोस कदम है।
केंद्रीय मंत्री ने राज्यों और औद्योगिक घरानों से आग्रह किया कि वे स्टार्टअप्स द्वारा विकसित स्वदेशी तकनीकों का मूल्यांकन कर उनकी खरीद और उपयोग को प्राथमिकता दें। उन्होंने कहा कि किसी भी मिशन की वास्तविक प्रगति केवल प्रदर्शनों से नहीं, बल्कि जुटाए गए निवेश, सत्यापित तकनीकों और जमीनी स्तर पर अपनाए गए नवाचारों से आंकी जाती है।
बैठक में उपस्थित भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. अजय कुमार सूद ने रेखांकित किया कि विषयगत केंद्रों से निकली लगभग 52 प्रौद्योगिकियां यह दर्शाती हैं कि शोध से बाजार तक का फासला कम हो रहा है। इस उच्चस्तरीय सत्र में नीति आयोग के सदस्य प्रो. अभय करंदीकर, डीएसटी सचिव प्रो. उमेश वी. वाघमारे और मिशन निदेशक डॉ. जे. बी. वी. रेड्डी सहित उद्योग व शोध जगत के प्रमुख विशेषज्ञ शामिल रहे।



