पूर्वोत्तर में 125 साल का रिकॉर्ड टूटा: दक्षिण-पश्चिम मानसून में सबसे कम वर्षा, सितंबर में असामान्य गर्मी

पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून ने 125 वर्षों का सबसे गंभीर सूखा देखा है, जिसकी आधिकारिक पुष्टि भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने गुरुवार को की। जून से सितंबर के मानसूनी दौर में इस पूरे भूभाग में केवल 1,017.1 मिलीमीटर वर्षा दर्ज हो सकी। आधिकारिक स्तर पर 1901 में बारिश का लेखा-जोखा शुरू किए जाने के बाद से 2026 का यह आंकड़ा अब तक का सबसे कमजोर प्रदर्शन है, जो इस नम और प्रचुर वर्षा वाले अंचल के स्वाभाविक मौसम तंत्र में एक भारी उलटफेर की ओर संकेत करता है।
आईएमडी के मौसम वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि असम, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश के मौसम सब-डिवीजन में बारिश का अभाव लगातार चार महीनों तक खिंचता चला गया। जून से लेकर सितंबर तक के किसी भी महीने में वर्षा सामान्य आंकड़े को नहीं छू सकी। चूंकि पूर्वोत्तर की पूरी कृषि व्यवस्था, प्राकृतिक जल स्रोत और आजीविका मानसूनी जल पर निर्भर है, इसलिए इस पूरे सीजन में पानी की कमी का बने रहना बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील पहलू बन गया है।
देशभर के परिदृश्य पर नजर डालें तो राष्ट्रीय स्तर पर भी चालू वर्ष का चार महीने का सत्र सामान्य वर्षा स्तर को हासिल नहीं कर सका। समूचे भारत में इस दौरान 759.4 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई, जिसके चलते वर्ष 2026 का सीजन 1901 के बाद से 13वां सबसे कम वर्षा वाला और 2001 से अब तक का चौथा सबसे कमजोर मानसून बन गया। इसके बावजूद, पूर्वोत्तर की स्थिति राष्ट्रीय आंकड़ों से कहीं ज्यादा विषम रही, क्योंकि सितंबर के अंत में असम में हुई तीव्र वर्षा भी मौसमी घाटे को कम करने में असमर्थ रही।
विभाग के तकनीकी आकलन से यह बात सामने आई कि अंतिम दिनों के तीव्र स्पेल कुल मौसमी कमी की भरपाई नहीं कर सके। कम बारिश की मार के बीच इलाके को सितंबर में असामान्य उच्च तापमान का भी सामना करना पड़ा। पूर्वी व पूर्वोत्तर भारत में औसत तापमान सामान्य से 0.74 डिग्री अधिक चढ़कर 27.95 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो 1901 के बाद का छठा सबसे गर्म सितंबर साबित हुआ।
अक्टूबर के संदर्भ में विभाग ने संकेत दिए हैं कि देश के बड़े भूभाग में मानसूनी गतिविधियां सामान्य से मंद रहेंगी, यद्यपि पूर्वी भारत की कुछ जगहों पर सामान्य से अधिक पानी बरस सकता है। वहीं तापमान के रुझान बताते हैं कि पूर्वोत्तर में अधिकतम पारा सामान्य स्तर पर टिके रहने और न्यूनतम तापमान के सामान्य से नीचे लुढ़कने के आसार हैं, जिससे मानसून के बाद के इस संक्रमण काल में मौसम की अनिश्चितता बनी रहेगी।



