“वांगचुक पूरी तरह फिट, मेडिकल आधार पर रिहाई संभव नहीं” – सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की दलील

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को लद्दाख के कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हिरासत को लेकर केंद्र सरकार से तीखे सवाल किए। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने इस बात पर संदेह जताया कि क्या वांगचुक के बयानों का लेह में हुई 24 सितंबर 2025 की हिंसा से कोई सीधा संबंध है।
अदालत की मुख्य टिप्पणियाँ:
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भाषण का विश्लेषण: अदालत ने केंद्र के इस दावे को चुनौती दी कि वांगचुक युवाओं को भड़का रहे थे। बेंच ने कहा कि उनके भाषणों को पढ़ने से ऐसा लगता है जैसे वे हिंसा का समर्थन करने के बजाय उस पर चिंता जता रहे हैं।
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हिंसा से संबंध: कोर्ट ने पूछा कि आखिर सरकार ने यह निष्कर्ष कैसे निकाला कि उनके सोशल मीडिया पोस्ट और भाषणों ने ही दंगों को उकसाया।
केंद्र की ओर से पेश ASG केएम नटराज ने तर्क दिया कि वांगचुक ने नेपाल जैसे हालात बनने की चेतावनी देकर युवाओं को उकसाया, जिसके कारण लेह में अशांति फैली।
सोनम वांगचुक की जेल से रिहाई की मांग पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कड़ा रुख अपनाया है। सरकार ने स्पष्ट किया कि वांगचुक को चिकित्सा के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती क्योंकि उनकी सेहत स्थिर है।
मुख्य तर्क और तथ्य:
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मेडिकल जांच: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि जोधपुर जेल में वांगचुक की अब तक 24 बार मेडिकल जांच हो चुकी है। उन्हें केवल पाचन और मामूली संक्रमण की समस्या थी, जिसका उपचार कर दिया गया है।
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समानता का तर्क: मेहता ने दलील दी कि यदि मामूली बीमारियों के आधार पर रिहाई दी गई, तो यह अन्य कैदियों के लिए भी एक उदाहरण बन जाएगा, जो कानून व्यवस्था के लिए ठीक नहीं है।
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NSA की पृष्ठभूमि: गौरतलब है कि 24 सितंबर 2025 की हिंसा के आरोप में वांगचुक को 26 सितंबर को गिरफ्तार किया गया था। सरकार का आरोप है कि वे लद्दाख की स्थिति को नेपाल या बांग्लादेश जैसा बनाना चाहते हैं।



