भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता: आयुष और पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को मिलेगी वैश्विक पहचान

भारत और न्यूजीलैंड के बीच संपन्न हुआ नया मुक्त व्यापार समझौता (FTA) देश की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों और समग्र स्वास्थ्य सेवाओं के अंतरराष्ट्रीय विस्तार के लिए एक मील का पत्थर साबित होने वाला है। इस ऐतिहासिक समझौते पर भारत के केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और न्यूजीलैंड के व्यापार एवं निवेश मंत्री टॉड मैक्ले ने हस्ताक्षर किए। यह संधि न केवल दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों को नई ऊंचाई प्रदान करेगी, बल्कि आयुष (AYUSH) को वैश्विक स्वास्थ्य ढांचे के केंद्र में स्थापित करने का मार्ग भी प्रशस्त करेगी।

इस समझौते की सबसे बड़ी विशेषता स्वास्थ्य और पारंपरिक चिकित्सा के लिए एक विशेष और समर्पित अनुबंध का होना है। न्यूजीलैंड ने पहली बार किसी देश के साथ इस तरह की व्यवस्था पर सहमति जताई है। इसके तहत आयुर्वेद, योग और अन्य पारंपरिक उपचार पद्धतियों के निर्यात और सेवाओं के लिए एक सुलभ वातावरण तैयार किया जाएगा। विशेष बात यह है कि इस फ्रेमवर्क में भारत की आयुष प्रणालियों के साथ-साथ न्यूजीलैंड की स्थानीय जनजातीय ‘माओरी’ स्वास्थ्य पद्धतियों को भी वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक समाधान के रूप में मान्यता देने की पहल की गई है।

सेवा क्षेत्र के दृष्टिकोण से यह एफटीए भारतीय आयुष चिकित्सकों और संस्थानों के लिए बाजार के नए द्वार खोलता है। यूनानी, सिद्धा, होम्योपैथी, प्राकृतिक चिकित्सा और सोवा-रिग्पा जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले पेशेवरों के लिए अब न्यूजीलैंड में अपनी सेवाएं देना आसान होगा। इससे न केवल भारत के निवारक स्वास्थ्य देखभाल मॉडल को मजबूती मिलेगी, बल्कि चिकित्सा पर्यटन (मेडिकल टूरिज्म) और अनुसंधान के क्षेत्र में भी संस्थागत निवेश और साझेदारी बढ़ने की प्रबल संभावना है।

पेशेवरों की गतिशीलता को बढ़ाने के लिए समझौते में एक विशेष वीजा कोटा का प्रावधान भी शामिल किया गया है। इसके माध्यम से योग्य आयुष चिकित्सकों और योग प्रशिक्षकों को न्यूजीलैंड में दीर्घकालिक कार्य करने का अवसर प्राप्त होगा। यह कदम भारत को पारंपरिक ज्ञान-आधारित सेवाओं के एक प्रमुख वैश्विक प्रदाता के रूप में स्थापित करने की दिशा में अत्यंत प्रभावी माना जा रहा है।

अंतिम चरण में, यह समझौता शिक्षा, प्रशिक्षण और मानक विकास के क्षेत्रों में तकनीकी सहयोग को संस्थागत स्वरूप प्रदान करता है। पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को आधुनिक व्यापारिक ढांचे के साथ जोड़कर, यह पहल आयुष को केवल एक राष्ट्रीय विरासत तक सीमित न रखकर वैश्विक कल्याण के एक मजबूत स्तंभ के रूप में विकसित करने के भारत के दृष्टिकोण को साकार करती है।

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