संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार प्रक्रिया पर भारत ने उठाए सवाल, बहुमत की आवाज दबाने का लगाया आरोप
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी हरीश ने सुरक्षा परिषद सुधारों को लेकर चल रही अंतर-सरकारी वार्ता (आईजीएन) की बैठक में चर्चाओं के रिकॉर्ड रखने की पद्धति पर गंभीर आपत्ति जताई है। जी4 (G4) समूह की तरफ से बोलते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि पिछली बैठक के आधिकारिक दस्तावेज में स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में सदस्यता विस्तार के व्यापक समर्थन को निष्पक्षता से दर्ज नहीं किया गया है।
भारतीय प्रतिनिधि के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के अधिकांश सदस्य देश सुरक्षा परिषद के दोनों स्वरूपों में विस्तार के पक्ष में हैं। इसके बावजूद, बैठक के ‘एलिमेंट्स पेपर’ में इस भारी समर्थन को केवल ‘महत्वपूर्ण समर्थन’ के रूप में दिखाना बहुसंख्यक देशों की राय को कमतर आंकने जैसा है। उन्होंने मांग की कि इस मौजूदा सत्र के दस्तावेज में सदस्य देशों के वास्तविक रुख और उनकी भावनाओं का सही व पारदर्शी चित्रण होना चाहिए।
इस मामले में अभी तक वार्ता के लिए कोई आधिकारिक मसौदा (ड्राफ्ट टेक्स्ट) तैयार नहीं किया जा सका है, क्योंकि कुछ देशों का एक छोटा गुट लगातार इस प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न कर रहा है। ऐसी स्थिति में ‘एलिमेंट्स पेपर’ ही चर्चा को आगे ले जाने का एकमात्र जरिया बचा है, जिसमें सुधार से जुड़े विभिन्न प्रस्तावों को मिलने वाले समर्थन का ब्योरा होता है। पिछले सत्र के दौरान अफ्रीकी देशों द्वारा उठाई गई संयुक्त मांग पर भी विचार-विमर्श हुआ था, जिसमें दोनों श्रेणियों में सीटें बढ़ाने पर जोर दिया गया था और इसे व्यापक देशों का समर्थन भी मिला था।
सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता बढ़ाने के इस प्रयास का “यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस” (यूएफसी) नामक एक छोटा समूह लगातार विरोध कर रहा है। इटली की अगुवाई वाले इस समूह में पाकिस्तान भी प्रमुखता से शामिल है, जो प्रक्रियात्मक नियमों की आड़ लेकर बातचीत के आधिकारिक मसौदे को आगे बढ़ने से रोकता रहा है। इस पर भारत ने साफ किया कि जी4 समूह एक साझा मॉडल के तहत लिखित पाठ-आधारित (टेक्स्ट-बेस्ड) वार्ता शुरू करने का पक्षधर है, जो पूरी तरह निष्पक्ष हो और जिसमें सभी पक्षों के विचारों का समावेश हो।
यूएफसी समूह का तर्क है कि जब तक सभी देशों के बीच पूर्ण आम सहमति नहीं बन जाती, तब तक वार्ता के लिए कोई आधिकारिक टेक्स्ट तैयार नहीं किया जा सकता। इसके जवाब में पी हरीश ने तर्क दिया कि एक संयुक्त मॉडल बातचीत की शुरुआत की रूपरेखा होता है, उसका अंतिम परिणाम नहीं। इसे महज न्यूनतम साझा राय या पूर्ण सहमति के नाम पर सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विभिन्न देशों और गुटों के बीच के मतभेदों को पाटने वाले नए सुझाव और प्रस्ताव केवल लिखित पाठ-आधारित वार्ता के माध्यम से ही सामने आ सकते हैं।
अंत में भारतीय स्थायी प्रतिनिधि ने सचेत करते हुए कहा कि यदि जल्द ही लिखित पाठ के आधार पर औपचारिक बातचीत शुरू नहीं की गई, तो आईजीएन की इस पूरी प्रक्रिया में कोई भी वास्तविक प्रगति संभव नहीं होगी। सुधारों के प्रबल समर्थक के रूप में जी4 समूह ने एक बार फिर दोहराया है कि बिना किसी अतिरिक्त विलंब के इस विषय पर लिखित मसौदे के आधार पर चर्चा तुरंत शुरू की जानी चाहिए।



