जुलाई में भारत की निजी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों में बढ़त कायम, कंपोजिट पीएमआई 54.3 दर्ज

एसएंडपी ग्लोबल द्वारा संकलित एचएसबीसी फ्लैश पीएमआई सर्वेक्षण के अनुसार, जुलाई 2026 में भारत के निजी क्षेत्र की व्यावसायिक गतिविधियों में सकारात्मक विस्तार दर्ज किया गया। हालांकि, इस दौरान विकास की गति जून के मुकाबले कुछ सुस्त रही। जुलाई महीने में देश का कंपोजिट पीएमआई 54.3 दर्ज किया गया, जबकि जून में यह 57.1 के स्तर पर था। आर्थिक पैमानों के तहत पीएमआई का 50 से ऊपर रहना संबंधित क्षेत्र में मजबूती और प्रसार का प्रतीक माना जाता है।

सर्वेक्षण के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि सेवा क्षेत्र की रफ्तार में उल्लेखनीय गिरावट आई है। ग्राहकों की ओर से घटती पूछताछ, नए ऑर्डरों के रद्द होने और कमजोर मांग के कारण सर्विस पीएमआई जून के 57.4 से फिसलकर 53.1 पर आ गया। यह आंकड़ा बीते 53 महीनों का सबसे निचला स्तर है। इसके विपरीत, विनिर्माण क्षेत्र (मैन्युफैक्चरिंग) ने अपनी मजबूती को काफी हद तक बनाए रखा। मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई जून के 54.2 से मामूली घटकर 53.9 पर रहा, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत मांग के बल पर आउटपुट इंडेक्स 56.3 से बढ़कर 57.0 पर पहुंच गया।

उत्पादन लागत में बढ़ोतरी के बावजूद कारोबारी प्रतिष्ठानों ने नए रोजगार देने की प्रक्रिया को जारी रखा। इसके अतिरिक्त, मध्य पूर्व में जारी रणनीतिक और राजनीतिक तनाव को देखते हुए कंपनियों ने सप्लाई चेन में व्यवधान की आशंका के चलते अपने तैयार माल और इनपुट इनवेंटरी का अग्रिम भंडार बढ़ाना शुरू कर दिया है।

एचएसबीसी की मुख्य भारत अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी ने ताजा आंकड़ों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि मध्य पूर्व में गहराते तनाव के कारण कंपनियां आपूर्ति से जुड़े जोखिमों को कम करने के लिए सुरक्षात्मक कदम उठा रही हैं और अतिरिक्त बफर स्टॉक तैयार कर रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि नए व्यावसायिक सौदों में बढ़ोतरी तो हुई है, किंतु इसकी रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी रही है। कंपनियों ने अपने मार्जिन को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से आउटपुट चार्ज में वृद्धि की है।

जून के स्तर से कुछ नरमी के बावजूद 54.3 का कंपोजिट पीएमआई यह स्पष्ट करता है कि भारत का निजी क्षेत्र स्थिर और मजबूत बना हुआ है। जहां एक ओर सर्विस सेक्टर में मांग की कमी चिंता का विषय बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर निर्यात और विनिर्माण उत्पादन में हो रहा सुधार अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संदेश है। वैश्विक स्तर पर बनी अनिश्चितताओं और घरेलू मांग में आई मामूली सुस्ती के बीच ये आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था के जुझारूपन को रेखांकित करते हैं।

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