पवन ऊर्जा क्षेत्र में भारत की छलांग: 58 गीगावाट के पार पहुंची कुल स्थापित क्षमता, 2030 तक 100 गीगावाट का लक्ष्य

भारत ने 31 जुलाई 2026 तक 58.14 गीगावाट की कुल स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता दर्ज करते हुए स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और औद्योगिक विस्तार में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान देश में 6.05 गीगावाट की रिकॉर्ड नई क्षमता जोड़ी गई, जिसके साथ ही भारत अब वर्ष 2030 तक 100 गीगावाट के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में तेजी से अग्रसर है।
इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए देश को प्रतिवर्ष औसतन 10 गीगावाट नई क्षमता जोड़ने की आवश्यकता होगी। इंडियन विंड टरबाइन मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईडब्ल्यूटीएमए) के शोध के अनुसार, देश में फिलहाल करीब 43 गीगावाट क्षमता की पवन परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं, जबकि 150 मीटर हब ऊंचाई पर देश की कुल अनुमानित पवन क्षमता 1,164 गीगावाट आंकी गई है। उद्योग जगत ने वर्ष 2035 तक 155 गीगावाट क्षमता का खाका भी तैयार किया है। आईडब्ल्यूटीएमए के सचिव और सुजलॉन एनर्जी के अध्यक्ष (कॉरपोरेट अफेयर्स व रिटेल बिजनेस) दिनेश जगदाले के अनुसार, भारतीय पवन ऊर्जा क्षेत्र 58 गीगावाट से अधिक क्षमता के साथ एक सशक्त वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में परिपक्व हो चुका है। उन्होंने जोर दिया कि 100 गीगावाट के आंकड़े को छूने के लिए उपकरण निर्माताओं, परियोजना डेवलपर्स, नीति निर्धारकों और नवाचारकर्ताओं के मध्य निरंतर तालमेल आवश्यक है।
घरेलू विनिर्माण के मोर्चे पर भी देश ने मजबूत बढ़त बनाई है। वर्ष 2014 में देश की वार्षिक टरबाइन निर्माण क्षमता 10 गीगावाट थी, जो 70 से 80 प्रतिशत घरेलू मूल्यवर्धन के साथ अब बढ़कर 24 गीगावाट सालाना हो चुकी है। वित्त वर्ष 2025-26 में पवन ऊर्जा उपकरणों का विदेशी निर्यात लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करते हुए 12,000 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया। एनविज़न एनर्जी इंडिया के ग्लोबल बिजनेस डेवलपमेंट प्रमुख सुमन नाग ने कहा कि निर्यात आधारित कंपनियों का बढ़ता आधार भारत को एक प्रमुख वैश्विक पवन विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित कर रहा है।
जमीनी संयंत्रों के साथ-साथ अब अपतटीय (ऑफशोर) पवन ऊर्जा पर भी काम तेज हो गया है। देश में 1 गीगावाट की पायलट अपतटीय परियोजना पर कार्य चल रहा है, वहीं नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) ने आईडब्ल्यूटीएमए के साथ मिलकर ‘डब्ल्यूटी-मारुत’ (WT-MARUT) नामक विशेष अपतटीय वेब पोर्टल भी शुरू किया है। नई दिल्ली में आयोजित ‘विंडर्जी इंडिया 2026’ के कर्टेन रेजर कार्यक्रम में एमएनआरई के संयुक्त सचिव राजेश कुलहरि ने रेखांकित किया कि ऊर्जा संक्रमण का उद्देश्य सिर्फ मेगावाट क्षमता बढ़ाना नहीं है, बल्कि एक ऐसा औद्योगिक तंत्र खड़ा करना है जो स्थानीय रोजगार बढ़ाए, विनिर्माण को सशक्त करे और महंगे व अस्थिर आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाए।
व्यावसायिक स्तर पर उद्योग अब न्यूनतम टैरिफ की होड़ से आगे बढ़कर परियोजनाओं की व्यवहार्यता, समय पर विद्युत खरीद समझौते (पीपीए) और ग्रिड की तत्परता पर बल दे रहा है। वर्तमान में सौर-पवन हाइब्रिड, ऊर्जा भंडारण और फर्म एंड डिस्पैचेबल रिन्यूएबल एनर्जी (एफडीआरई) की मांग बढ़ रही है। साथ ही, विशालकाय टरबाइन घटकों के परिवहन, रूट प्लानिंग और डिजिटल लॉजिस्टिक्स प्रबंधन को प्राथमिकता दी जा रही है। दूसरी ओर, पुराने संयंत्रों की रिपावरिंग से उत्पादन क्षमता बढ़ाने की व्यापक संभावना है; उच्च पवन क्षमता वाले क्षेत्रों में मौजूद 19,000 से अधिक सब-मेगावाट टरबाइनों को आधुनिक तकनीक से अपग्रेड कर उनकी क्षमता उपयोग दर (सीयूएफ) 14-15 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत तक की जा सकती है, जिससे अतिरिक्त जमीन के बिना ग्रिड का बेहतर उपयोग संभव होगा।
इन तमाम रणनीतिक विषयों पर आगामी 7 से 9 अक्टूबर 2026 तक चेन्नई ट्रेड सेंटर में ‘विंडर्जी इंडिया 2026’ के आठवें संस्करण में मंथन होगा। विद्युत मंत्रालय और एमएनआरई के सहयोग से आईडब्ल्यूटीएमए व पीडीए वेंचर्स द्वारा आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में 30 से अधिक देशों के 350 प्रदर्शक, 400 प्रतिनिधि और 20,000 से अधिक प्रतिभागी भाग लेंगे। आयोजन में सुजलॉन इंडिया प्लेटिनम पार्टनर, एनविज़न व सेनवियॉन गोल्ड पार्टनर तथा मेनज़ियोन व रक्षा सिल्वर पार्टनर हैं। जर्मनी, डेनमार्क और स्पेन के मंडपों के साथ यह आयोजन ‘विंड- पावरिंग इंडियाज एनर्जी रेजिलिएंस’ विषय पर दो दिवसीय सम्मेलन और विशेष अकादमिक सत्र की मेजबानी करेगा।



