धरती के आंतरिक ताप से ऊर्जा सुरक्षा साधेगा भारत: 10.6 गीगावॉट क्षमता के दोहन के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना पर अमल शुरू

भारत सरकार के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा सितंबर 2025 में घोषित राष्ट्रीय नीति के आधार पर देश में चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने वाले भूतापीय ऊर्जा संसाधनों का व्यवस्थित दोहन शुरू हो गया है। इस दिशा में सबसे ठोस प्रगति जुलाई 2026 में सामने आई, जब ओएनजीसी ऊर्जा केंद्र ने लद्दाख की पूगा घाटी में करीब 1,000 मीटर की गहराई वाले देश के शुरुआती दो भूतापीय कुओं को सक्रिय कर दिया। यह कदम वर्ष 2070 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन प्राप्त करने की भारत की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता का अहम हिस्सा है।

मौसम पर निर्भर रहने वाली सौर और पवन ऊर्जा की तुलना में भूतापीय ऊर्जा निरंतर आधार-भार (बेस-लोड) बिजली देने में सक्षम है। लद्दाख के अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र में शुरू किए गए परीक्षण कुओं का प्राथमिक उद्देश्य भूमिगत तापीय भंडार की उत्पादकता का विश्लेषण करना है। यह तकनीकी आधार आगे चलकर देश की पहली 1 मेगावाट क्षमता की प्रायोगिक भूतापीय परियोजना को क्रियान्वित करने में सहायक होगा, जिससे उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थानीय ऊर्जा आत्मनिर्भरता को भी बल मिलेगा।

भूतापीय ऊर्जा का आधार पृथ्वी की आंतरिक संरचना है, जो ठोस भूपर्पटी (क्रस्ट), घने मैंटल, तरल बाहरी कोर और लोहे-निकल की 2,400 किलोमीटर चौड़ी ठोस आंतरिक कोर से मिलकर बनी है। रेडियोधर्मी तत्वों के क्षय से उत्पन्न 6,000 डिग्री सेल्सियस तक का कोर तापमान मैंटल में संवहन धाराएं पैदा करता है। यही प्राकृतिक ताप भूमिगत जल को उच्च दाब वाली भाप में परिवर्तित करता है, जिसका उपयोग टरबाइन घुमाकर बिजली बनाने में किया जाता है। बिजली उत्पादन के बाद जल को वापस जमीन में इंजेक्ट करने की बंद प्रणाली इसे पूरी तरह टिकाऊ और नवीकरणीय बनाती है।

देश भर में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने 381 गर्म झरनों का दस्तावेजीकरण किया है, जिनसे 10.6 गीगावॉट स्वच्छ ऊर्जा प्राप्त करने की सैद्धांतिक क्षमता का अनुमान है। चिन्हित 10 भूतापीय प्रांतों में हिमालय, नागा-लुसाई, अरावली, महानदी और दक्षिण भारतीय क्रेटोनिक क्षेत्र प्रमुख हैं। अन्वेषण लागत और जोखिम घटाने के लिए राष्ट्रीय नीति में बंद पड़े या गैर-उत्पादक तेल और गैस कुओं के दोबारा इस्तेमाल का भी प्रावधान किया गया है, जिससे मौजूदा ड्रिलिंग बुनियादी ढांचे का लाभ उठाया जा सके।

प्रौद्योगिकी विकास के तहत जुलाई और अगस्त 2025 में स्वीकृत अनुसंधान परियोजनाओं के परिणाम अब जमीन पर दिखने लगे हैं। गुजरात के गांधीनगर में तीन कुओं के माध्यम से 50 से 90 किलोवाट ऊर्जा उत्पादन का सफल परीक्षण हो चुका है, जबकि अंकलेश्वर में अनुपयोगी हाइड्रोकार्बन कुओं का तकनीकी मूल्यांकन पूरा किया गया है। पूर्वोत्तर में अरुणाचल प्रदेश के तवांग तथा दक्षिण में तेलंगाना के हैदराबाद में भी शीतलन और ताप अनुप्रयोगों पर केंद्रित परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं।

वर्तमान में दुनिया की कुल 15.67 गीगावॉट भूतापीय क्षमता का दो-तिहाई हिस्सा केवल पांच देशों के पास केंद्रित है। भारत अब वैश्विक तकनीकी साझेदारियों—विशेषकर आइसलैंड, ऑस्ट्रेलिया और सऊदी अरब के साथ सहयोग—के जरिए स्वदेशी क्षमताओं का विस्तार कर रहा है। राष्ट्रीय डेटा भंडार, पायलट प्रोजेक्ट्स और वर्धित भूतापीय प्रणालियों (ईजीएस) के बल पर भारत इस भूमिगत प्राकृतिक संसाधन को राष्ट्रीय ग्रिड की मुख्यधारा में शामिल करने की ओर बढ़ रहा है।

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