आर्थिक महाशक्ति बनता ब्रिक्स: 2026 में भारतीय नेतृत्व से पहले रणनीतिक विस्तार और साझा बाजार की चुनौतियां

वर्ष 2026 में भारत में आयोजित होने वाले आगामी ब्रिक्स सम्मेलन के मद्देनजर यह समूह अपनी आर्थिक मजबूती, नए सदस्यों के जुड़ाव और बहुध्रुवीय व्यवस्था में अपने बढ़ते प्रभाव को लेकर चर्चा के केंद्र में है। दो दशक पूर्व एक आर्थिक शब्दावली के रूप में अस्तित्व में आया यह गठबंधन आज समकालीन विश्व व्यवस्था का एक मजबूत और अपरिहार्य मंच बन चुका है।

वरिष्ठ विश्लेषक आरएन भास्कर के अनुसार, गोल्डमैन सैक्स द्वारा प्रस्तुत ब्राजील, रूस, भारत और चीन का यह ढांचा आरंभ में एक कल्पित विचार भर था। कालांतर में रूस के दृष्टिकोण ने इसे एक वास्तविक और रणनीतिक मंच का रूप दिया। वर्ष 2010 में दक्षिण अफ्रीका के प्रवेश और हाल के दिनों में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, यूएई तथा सऊदी अरब के शामिल होने से इसका भू-राजनीतिक दायरा अत्यंत विस्तृत हो चुका है। अब यह मंच आर्थिक चर्चाओं से आगे बढ़कर वैश्विक शासन, व्यापार नीतियों, निवेश, विकास और सुरक्षित सप्लाई चेन जैसे विषयों पर नीतिगत समन्वय का काम कर रहा है।

वित्तीय आंकड़ों के धरातल पर समूह का प्रभाव निरंतर बढ़ा है। आईएमएफ के 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, क्रय शक्ति समता (पीपीपी) आधारित वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में ब्रिक्स देशों का हिस्सा लगभग 40 प्रतिशत पहुंच गया, जो जी-7 देशों की करीब 29 प्रतिशत हिस्सेदारी से उल्लेखनीय रूप से अधिक है। अंकटाड के अनुसार, सदस्यों के बीच आपसी व्यापार 2003 के 84 अरब डॉलर से 13 गुना से ज्यादा की छलांग लगाकर 2024 में लगभग 1.17 ट्रिलियन डॉलर का हो गया। इसके बावजूद यह आंकड़ा कुल वैश्विक व्यापार का महज 5 प्रतिशत ही दर्शाता है। वहीं, विश्व मर्चेंडाइज निर्यात में ब्रिक्स की हिस्सेदारी 2003 के 12 प्रतिशत से दोगुनी होकर 2024 में 24 प्रतिशत यानी एक ट्रिलियन से छह ट्रिलियन डॉलर पर पहुंच गई, जिसमें चीन का आयात-निर्यात में दबदबा कायम है।

इस प्रगति के बीच विशेषज्ञ गहरे संरचनात्मक समन्वय को लेकर सतर्क दृष्टिकोण रखते हैं। आईआईएफटी के पूर्व वाइस चांसलर प्रो. मनोज पंत का मत है कि विश्व व्यापार का मुख्य ध्रुव चीन बना हुआ है और व्यापारिक वृद्धि का अर्थ यह नहीं है कि एक मजबूत आर्थिक गुट तैयार हो गया है। उनका विश्लेषण है कि छोटे उद्योगों के बीच दूरसंचार, संस्थागत संपर्क और व्यावहारिक तालमेल की कमी एक एकीकृत ब्रिक्स बाजार के मार्ग में बाधा है। प्रो. पंत केवल व्यापार के बजाय निवेश को अधिक ठोस आधार मानते हैं, क्योंकि वास्तविक आर्थिक अंतर्संबंध निवेश से ही स्थापित होते हैं। वहीं, आरएन भास्कर का कहना है कि भारत का इस मंच से जुड़ाव विकासशील राष्ट्रों के नेतृत्व और ग्लोबल साउथ के हितों की रक्षा से जुड़ा है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि पश्चिमी प्रतिबंधों के दबाव के बावजूद यह व्यवस्था सक्रिय है और स्थानीय व गैर-डॉलर मुद्राओं में कारोबार को बढ़ावा मिल रहा है।

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