बर्लिन में बोले पीयूष गोयल: 11 साल बाद भी नहीं मिला क्लाइमेट फंड का पैसा, यूरोपीय संघ और अमीर देश वादों से मुकरे

बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में आयोजित एक परिचर्चा के दौरान केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने यूरोपीय संघ और अमीर मुल्कों के जलवायु रवैये पर कड़े सवाल उठाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐतिहासिक स्तर पर सर्वाधिक प्रदूषण फैलाने वाले विकसित देशों ने ग्लोबल साउथ को प्रतिवर्ष 100 अरब डॉलर की क्लाइमेट फंडिंग देने का जो वचन दिया था, उसमें से अब तक विकासशील देशों को फूटी कौड़ी भी हासिल नहीं हुई है।

गोयल ने जोर देकर कहा कि मौजूदा जलवायु संकट के लिए मुख्य रूप से समृद्ध राष्ट्र ही उत्तरदायी हैं। पेरिस जलवायु समझौते की मूल भावना यही थी कि जिन अर्थव्यवस्थाओं ने लंबे समय तक वायुमंडल को प्रदूषित करके आर्थिक लाभ कमाए हैं, वे इसकी कीमत चुकाएंगी और तकनीकी व आर्थिक रूप से कमजोर राष्ट्रों को संकट से उबरने में सहायता करेंगी।

2015 की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर ग्लोबल साउथ एकजुट हुआ था और वैश्विक समुदाय जलवायु कार्रवाई के लिए आगे आया था। उस दौरान यह तय हुआ था कि प्रशांत तथा कैरेबियन सागर के द्वीपों, अल्पविकसित देशों और विकासशील क्षेत्रों के लिए सालाना 100 अरब डॉलर का कोष उपलब्ध कराया जाएगा।

इस वित्तीय वादे की पृष्ठभूमि समझाते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि कोपेनहेगन (2009) में विकसित देशों ने 2020 तक यह धनराशि जुटाने का संकल्प लिया था, जिसे पूरा न कर पाने पर पेरिस (2015) में मियाद 2025 तक बढ़ाई गई थी। वाणिज्य मंत्री ने कहा कि ग्यारह साल के लंबे अंतराल के बाद भी स्थिति जस की तस है। यूरोपीय संघ और उसकी नीतियां जैसे CBAM इस बात का कोई ठोस जवाब नहीं दे पा रही हैं कि कम विकसित देशों के डीकार्बोनाइजेशन प्रयासों को व्यावहारिक समर्थन क्यों नहीं मिला।

अपने संबोधन में उन्होंने जनसंख्या और उत्सर्जन के भारी अंतर की ओर वैश्विक नेताओं का ध्यान आकर्षित किया। गोयल ने कहा कि भारत विश्व की 17 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि उसका वैश्विक उत्सर्जन में योगदान महज 3 प्रतिशत से भी कम है। वहीं यूरोप मात्र 3 से 4 प्रतिशत आबादी के बावजूद भारी प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है, जिससे ओजोन परत और वायुमंडल को भारी क्षति पहुंची है।

उन्होंने आंकड़ों के साथ स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि यूरोप का प्रति व्यक्ति कार्बन फुटप्रिंट भारत की तुलना में सात से आठ गुना तक ज्यादा है, जबकि भारत अपनी विशाल आबादी के साथ पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली और चक्रीय अर्थव्यवस्था पर बल देता है। भारत अपनी 1.4 अरब जनता की ऊर्जा सुरक्षा, आजीविका और संरक्षा को सुनिश्चित करते हुए भी विश्व के अग्रणी और सबसे तेज गति वाले हरित ऊर्जा अभियानों को आगे बढ़ा रहा है।

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