कृषि क्षेत्र में मध्यप्रदेश का ऐतिहासिक कदम, एक साथ 12 बागवानी उत्पादों को मिला जीआई टैग
मध्यप्रदेश ने कृषि और बागवानी के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व राष्ट्रीय कीर्तिमान स्थापित किया है। देश में पहली बार किसी राज्य को एक साथ 12 उद्यानिकी फसलों के लिए भौगोलिक संकेतक (जीआई टैग) प्रदान किया गया है। राज्य सरकार द्वारा कृषक कल्याण वर्ष के अंतर्गत किए जा रहे प्रयासों के बीच मिली इस बड़ी सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सूबे के किसानों से बागवानी फसलों को अपनाने का आह्वान किया है, ताकि उनकी आमदनी को दोगुना किया जा सके। वर्तमान में राज्य के भीतर 28 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में उद्यानिकी फसलें उगाई जा रही हैं, जिसे वर्ष 2030 तक बढ़ाकर 30 लाख हेक्टेयर करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
केंद्रीय प्राधिकरण द्वारा स्वीकृत किए गए इन विशिष्ट उत्पादों में गुना की प्रसिद्ध धनिया, नरसिंहपुर के बरमान घाट के विशेष भटे (बैंगन), बैतूल का गजरिया आम, खरगोन की तीखी लाल मिर्च और मांडू की ऐतिहासिक खुरासानी इमली शामिल हैं। इसके अतिरिक्त जबलपुर के हरी मटर व सिंघाड़ा, सिवनी का जंबो सीताफल, मालवा क्षेत्र का आलू व पारंपरिक गराडू, नरसिंहपुर का विशिष्ट गुड़ और अलीराजपुर के विशालकाय नूरजहां आम को भी यह अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल हुई है। इसके साथ ही प्रशासन ने उज्जैन की इमली, अलीराजपुर के अचारी आम, मालवा के सफेद प्याज, झाबुआ के दाल पानिया, मंदसौर के देसी जीरे, बुरहानपुर की प्रसिद्ध जलेबी और अशोक नगर की खिरनी को भी जीआई टैग दिलाने के लिए नए प्रस्ताव भेजे हैं।
जीआई उत्पाद सूची में शामिल गुना जिले की कुंभराज धनिया पिछले छह दशकों से उत्पादित की जा रही है, जो देश के कुल उत्पादन का करीब 20 से 25 प्रतिशत (लगभग 32,000 मीट्रिक टन सालाना) हिस्सेदारी रखती है। यह फसल 85-90 दिनों में तैयार होती है और इसमें मौजूद 0.4 से 0.50 प्रतिशत वाष्पशील तेल के कारण यह अत्यधिक खुशबूदार और मीठी होती है। वहीं नर्मदा तट की बलुई मिट्टी और अनुकूल कम तापमान में उपजने वाले नरसिंहपुर के बरमान भटे (बैंगन) अपने अनोखे स्वाद के कारण मंडियों में विशेष मांग रखते हैं। बैतूल जिले के 500 साल पुराने गोंड राजाओं के किलों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में पैदा होने वाला गजरिया आम भी अपनी विशिष्टता के लिए चुना गया है।
व्यापारिक दृष्टि से खरगोन जिले की लाल मिर्च अत्यधिक महत्वपूर्ण है, जिसका उत्पादन क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है। यहां के बेदिया (सनावद) में स्थित प्रदेश की बड़ी मिर्च मंडी से यह मिर्च चीन, मलयेशिया, सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे देशों को निर्यात की जाती है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अनूठी मांडू की खुरासानी इमली (बाओबाब) को 14वीं शताब्दी में महमूद खिलजी के काल में अफ्रीका से लाया गया था। उल्टे पेड़ जैसी आकृति वाले इस वृक्ष पर केवल वर्षा ऋतु में पत्तियां आती हैं। इसके अलावा सिवनी जिले में पैदा होने वाला जंबो सीताफल अपने भारी वजन (600 से 700 ग्राम) और विशेष स्वाद के कारण देश भर में प्रसिद्ध है।
मालवा क्षेत्र की बात करें तो देश के कुल आलू उत्पादन में 6.68 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाला मध्यप्रदेश पांचवां बड़ा उत्पादक है, जिसमें मालवी आलू की गुणवत्ता और रोग प्रतिरोधक क्षमता वैश्विक स्तर की है। इसी तरह मालवा का प्रमुख कंद ‘गराडू’ (बैंगनी रतालू) पारंपरिक और आधुनिक मिठाइयों में व्यापक रूप से इस्तेमाल होता है। जबलपुर की बात करें तो वहां की हरी मटर, जो 40-60 दिनों की रबी फसल है, प्रोटीन और फाइबर से भरपूर है। वर्ष 2018-19 में 31,360 हेक्टेयर में इसकी खेती से 52,500 टन उत्पादन हुआ था। वहीं जबलपुर और सतना के करीब 4,500 किसान सिंघाड़े की सात महीने की कठिन खेती से जुड़े हैं, जिसके फल में 80% जल और 52% स्टार्च पाया जाता है।
गन्ने के मामले में ‘मध्यप्रदेश का चीनी का कटोरा’ कहे जाने वाले नरसिंहपुर जिले की काली कपासी मिट्टी गुड़ उत्पादन के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। राज्य के कुल गन्ना क्षेत्र का 65% (75,000 हेक्टेयर) इसी जिले में है। यहां आधुनिक मिलें होने के बावजूद किसान अब स्वरोजगार के रूप में गुड़ निर्माण की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं, जो देश के कुल उत्पादन में 6% का योगदान देता है। अंत में, अलीराजपुर के कट्टीवाड़ा का आकर्षण ‘नूरजहां आम’ है, जो एक फुट तक लंबा और 3 से 3.5 किलोग्राम तक भारी होता है। माना जाता है कि यह दुर्लभ प्रजाति सदियों पहले अफगानिस्तान से गुजरात के रास्ते यहां पहुंची थी, जिसे अब आधिकारिक पहचान मिल गई है।


