ईरान युद्ध और वैश्विक अस्थिरता के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत: RBI

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के मासिक बुलेटिन में कहा गया है कि मध्य पूर्व में चल रहे ईरान युद्ध और वैश्विक बाजारों में बढ़ती अस्थिरता के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है। 2025-26 के लिए जारी किए गए जीडीपी के दूसरे अग्रिम अनुमान भी इस मजबूती को दर्शाते हैं।
बुलेटिन के अनुसार, फरवरी में देश में आर्थिक गतिविधियों में तेजी देखी गई। महंगाई (CPI) में वृद्धि मुख्य रूप से खाद्य और पेय पदार्थों के कारण हुई। देश में नकदी (लिक्विडिटी) पर्याप्त थी और व्यापारिक क्षेत्रों को मिलने वाली वित्तीय सहायता में बढ़ोतरी हुई। इसके अलावा, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी पर्याप्त मजबूत है, जिससे वैश्विक झटकों से बचाव संभव है।
रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिका द्वारा व्यापार जांच और मध्य पूर्व में युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, आयात शुल्क और सप्लाई चेन में अनिश्चितता बढ़ी है। घरेलू स्तर पर, कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता को देखते हुए स्थिति पर नजर रखना आवश्यक है। RBI ने यह भी बताया कि समय के साथ भारत की अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों को झेलने में अधिक सक्षम हुई है।
ऊर्जा सुरक्षा के मामले में भारत ने तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाई है और रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाई है। सरकार ने युद्ध के बाद कई कदम उठाए हैं ताकि वैश्विक सप्लाई बाधाओं का प्रभाव कम किया जा सके। RBI ने ‘इकोनॉमिक स्टेबलाइजेशन फंड’ बनाने की भी सलाह दी है, ताकि भविष्य में वैश्विक संकट के समय अतिरिक्त वित्तीय सहायता उपलब्ध हो सके।
जीडीपी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में आर्थिक वृद्धि मजबूत रही। घरेलू मांग में वृद्धि, निजी खपत और निवेश दोनों मजबूत रहे। तीसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी। फरवरी में शहरी और ग्रामीण बाजारों में मांग मजबूत रही। टू-व्हीलर, पैसेंजर वाहन और ट्रैक्टर की बिक्री रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। कृषि क्षेत्र भी मजबूत रहा और खाद्यान्न उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर रहने का अनुमान है।
वैश्विक स्तर पर, मध्य पूर्व के तनाव के कारण तेल और गैस की सप्लाई बाधित हुई, जिससे कमोडिटी और वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ा। ब्रेंट क्रूड की कीमतें 78 डॉलर से बढ़कर 112.2 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। एल्यूमिनियम और यूरिया जैसे औद्योगिक उत्पाद भी प्रभावित हुए।
RBI बुलेटिन में कहा गया कि ऊर्जा संकट का असर वित्तीय बाजारों पर भी पड़ा। मार्च में शेयर बाजारों में गिरावट आई और बॉन्ड मार्केट में बदलाव देखने को मिला। अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ। इस स्थिति में दुनिया के बड़े केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया और सतर्क रुख अपनाया।



