कान्हा में गूंजेगी ‘नर्मदा टाइगर’ की दहाड़ के बीच जंगली भैंसों की हुंकार, असम से आए 4 नए मेहमान

मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में करीब 100 वर्षों से विलुप्त हो चुकी जंगली भैंसा प्रजाति की ‘घर वापसी’ हो गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बुधवार को बालाघाट के सूपखार क्षेत्र में असम के काजीरंगा से लाए गए चार जंगली भैंसों को विशेष बाड़े में मुक्त कर इस महत्वाकांक्षी योजना का आगाज किया। भारतीय वन्यजीव संस्थान (देहरादून) के अध्ययन में कान्हा के घास के मैदानों और जल स्रोतों को इस प्रजाति के लिए देश में सबसे उपयुक्त पाया गया था, जिसके बाद इस जटिल ऑपरेशन को अंजाम दिया गया।

अंतरराज्यीय सहयोग की मिसाल पेश करते हुए इस अभियान का प्रथम चरण 19 मार्च से 10 अप्रैल 2026 के बीच शुरू हुआ था, जिसमें काजीरंगा के विभिन्न क्षेत्रों से स्वस्थ किशोर भैंसों का चयन किया गया। 25 अप्रैल को इन चार मेहमानों ने काजीरंगा से कान्हा तक का अपना 2000 किलोमीटर लंबा सफर पूरा किया। मुख्यमंत्री ने इस सफलता के लिए वन विभाग की टीम की सराहना की और कहा कि जंगली भैंसों के आने से कान्हा के घास के मैदानों के प्रबंधन में वैज्ञानिक रूप से सुधार होगा और जैव विविधता को बढ़ावा मिलेगा।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने अपने संबोधन में कहा कि मध्य प्रदेश आज वन्यजीव संरक्षण के मामले में देश के सामने एक मिसाल पेश कर रहा है। उन्होंने कहा, “हम केवल अधोसंरचना का विकास ही नहीं कर रहे, बल्कि अपनी प्राकृतिक धरोहर को भी संजो रहे हैं। असम से गैंडों के जोड़े लाने की योजना पर भी काम चल रहा है।” मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि वन्यजीवों की बढ़ती संख्या से न केवल पारिस्थितिक तंत्र मजबूत होगा, बल्कि पर्यटन बढ़ने से स्थानीय लोगों के लिए आजीविका के नए स्रोत भी खुलेंगे।

इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ स्थानीय जनप्रतिनिधि भी मौजूद रहे। मुख्यमंत्री ने विश्वास जताया कि जिस तरह मध्य प्रदेश ने चीतों के सफल पुनर्वास में सफलता पाई है, उसी तरह जंगली भैंसों की यह आबादी भी कान्हा के जंगलों में फलेगी-फूलेगी। ज्ञात हो कि वर्तमान में जंगली भैंसों की प्राकृतिक आबादी मुख्य रूप से असम तक सीमित है और मध्य प्रदेश में इनकी पुनर्स्थापना को वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक बड़ी जीत माना जा रहा है।

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