नीमच की हर्बल मंडी बनी किसानों की संबल, औषधीय फसलों के उत्पादन में देश में शीर्ष पर मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश का नीमच जिला अपनी विशिष्ट हर्बल कृषि उपज मंडी के कारण देश के औषधीय फसल उत्पादक किसानों के लिए एक बड़ा संबल बन चुका है। यह भारत की इकलौती ऐसी कृषि मंडी है, जहां औषधीय पौधों के हर हिस्से- चाहे वह जड़, तना, छाल, पत्तियां, छिलके, फूल हों या कांटे, सबकी व्यावसायिक खरीद की जाती है। मंडी में किसानों को उनकी फसलों की गुणवत्ता के आधार पर ₹500 से लेकर ₹2 लाख प्रति क्विंटल तक के भाव आसानी से मिल रहे हैं। इस अनूठी विशेषता के कारण अब मध्य प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसान भी अपनी उपजों की बिक्री के लिए भारी संख्या में यहां पहुंच रहे हैं।
मंडी प्रशासन के अनुसार, अप्रैल माह तक यहां फसलों की भारी आवक देखी जाती है, जो मई के अंतिम सप्ताह तक आते-आते कुछ कम होने लगती है, परंतु यहां आने वाले किसी भी कृषक को अपनी फसल बेचे बिना वापस नहीं लौटना पड़ता। कुल 10.9 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तृत इस मुख्य मंडी परिसर में 16 विशाल शेड बनाए गए हैं। यह देश का एकमात्र ऐसा सबसे बड़ा मसाला और औषधीय विपणन केंद्र है, जहां प्रतिदिन 40 से 50 अलग-अलग प्रकार की जड़ी-बूटियों की खरीद के लिए खुली और पारदर्शी बोली लगाई जाती है।
नीमच के ही एक बड़े कृषक श्री नीलेश पाटीदार, जो अपने 12 सदस्यीय परिवार के साथ मिलकर 45 एकड़ भूमि पर खेती करते हैं, पिछले कुछ वर्षों से मसाला फसलों की पैदावार कर रहे हैं। उनके अनुभव के अनुसार इसबगोल, चिरायता, आजवाइन, किनोवा, चियासीड, तुलसी बीज, इरानी अकरकारा और लहसुन जैसी फसलों के बेहद लाभकारी मूल्य प्राप्त होते हैं। श्री पाटीदार ने प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा औषधीय खेती को दिए जा रहे प्रोत्साहन की सराहना करते हुए कहा कि यदि सरकार द्वारा जड़ी-बूटियों की वैज्ञानिक खेती के तौर-तरीकों का विधिवत प्रशिक्षण प्रदान किया जाए, तो उत्पादन के नतीजे और भी बेहतर हो सकते हैं। वर्तमान में उन्हें शासन स्तर से सभी आवश्यक सुविधाएं सुलभ हो रही हैं।
रतलाम जिले के आजमपुर डोडिया गांव के कृषक श्री प्रहलाद सिंह ने मंडी के अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि उन्हें अपनी अकरकारा के बीज और अश्वगंधा की फसल के उत्कृष्ट दाम मिले हैं। मंडी की सुव्यवस्थित व्यवस्था के कारण समय पर बोलियां पूरी हो जाती हैं और बिना किसी असुविधा के फसल बिक जाती है। मंडी स्टाफ और व्यापारियों का व्यवहार भी किसानों के प्रति बेहद सकारात्मक रहता है। इसी गांव के एक अन्य किसान श्री पंचम सिंह ने बताया कि वे अपनी आजवाइन और अश्वगंधा की उपज बेचने यहां आते हैं और उन्हें फसल की तौल के तुरंत बाद भुगतान प्राप्त हो जाता है। उन्होंने बताया कि इसबगोल, अश्वगंधा, कलौंजी, सतावारी, सफेद मूसली, केसर, सर्पगंधा और अकलकारा की जड़ों की बाजार में निरंतर मांग बनी रहती है, जिससे इसके दाम ऊंचे रहते हैं और इसी कारण देश के विभिन्न राज्यों के किसान लंबी दूरियां तय कर नीमच आते हैं।
मंडी की व्यवस्थाओं पर प्रकाश डालते हुए मंडी सचिव श्री उमेश बसेडिया शर्मा ने बताया कि सुदृढ़ वित्तीय प्रबंधन, पारदर्शी नीलामी और गुणवत्तापूर्ण तौल प्रणाली के कारण यह मंडी निरंतर प्रगति कर रही है। बुनियादी ढांचे को और मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय पादप बोर्ड द्वारा ₹5.5 करोड़ की अनुदान राशि प्रदान की गई है। मंडी में इलेक्ट्रॉनिक तोल-कांटों का उपयोग किया जाता है और माल को सीधे व्यापारियों के गोदामों तक पहुंचाने की सुविधा दी गई है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में यहां कुल 64.16 लाख क्विंटल तथा वर्ष 2025-26 में बढ़कर 72.40 क्विंटल कृषि उपजों की आवक दर्ज की गई। वर्तमान में मंडी संचालन के लिए 1100 अधिकृत व्यापारी और 150 से अधिक तुलावटी अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
औषधीय फसलों की खेती के क्षेत्र में मध्य प्रदेश राष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष स्थान पर काबिज है। प्रदेश के कुल 46 हजार 837 हेक्टेयर क्षेत्र में सफेद मूसली, ईसबगोल, कोलियस जैसी महत्वपूर्ण फसलों की बुआई की जा रही है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में राज्य का कुल औषधीय उत्पादन लगभग सवा लाख मीट्रिक टन रहा। देश-विदेश में इन प्राकृतिक औषधियों की बढ़ती स्वीकार्यता ने किसानों को इस ओर आकर्षित किया है, जिसके परिणामस्वरूप देश के कुल औषधीय उत्पादन का 44 प्रतिशत अकेले मध्य प्रदेश में उत्पादित हो रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार इन विशिष्ट फसलों की खेती के लिए 20 फीसदी से लेकर 50 फीसदी तक की सब्सिडी और अन्य आर्थिक सहायता दे रही है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं और किसानों का आर्थिक स्तर सुदृढ़ हो रहा है।

