मध्य प्रदेश में नवजात शिशु स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ा सुधार: एसएनसीयू में डिस्चार्ज दर राष्ट्रीय औसत से अधिक, ई-शिशु परियोजना से कम हुई मृत्यु दर

मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में स्वास्थ्य सेवाओं को लगातार मजबूत और उन्नत बनाया जा रहा है। राज्य सरकार महिला एवं शिशु स्वास्थ्य को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में शामिल कर आधुनिक चिकित्सा अधोसंरचना और विशेषज्ञ सेवाओं का विस्तार कर रही है। सरकार द्वारा संचालित प्रभावी निगरानी प्रणाली के परिणामस्वरूप राज्य में नवजात और मातृ स्वास्थ्य संकेतकों में लगातार सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। कम वजन वाले और गंभीर बीमारी से पीड़ित नवजात शिशुओं के इलाज के लिए प्रदेश में विशेष इकाइयां काम कर रही हैं।

वित्तीय वर्ष 2024-25 की तुलना में वर्ष 2025-26 के दौरान नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाइयों (एसएनसीयू) के कामकाज में बड़ा सुधार देखा गया है। वर्ष 2024-25 में जहां 1 लाख 29 हजार 212 नवजातों का इलाज किया गया था, वहीं वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर 1 लाख 34 हजार 410 हो गया। इसके साथ ही बच्चों के स्वस्थ होने के बाद अस्पताल से छुट्टी मिलने की दर (डिस्चार्ज रेट) 82.3 प्रतिशत दर्ज की गई है, जो अब तक का सबसे बेहतरीन स्तर है।

मौजूदा वित्तीय वर्ष में 1 अप्रैल से 15 मई 2026 के बीच राज्य की 62 एसएनसीयू में कुल 15 हजार 54 नवजात शिशुओं को भर्ती कर उपचार दिया गया। इनमें से 12 हजार 818 शिशुओं को पूर्णतः स्वस्थ होने पर डिस्चार्ज किया गया। इस अवधि में यहां की डिस्चार्ज दर 85.2 प्रतिशत रही, जो राष्ट्रीय औसत से भी ज्यादा है। इसके विपरीत, बिना चिकित्सीय सलाह के चले जाने (लामा) की दर केवल 2.12 प्रतिशत, दूसरे अस्पतालों में रेफर करने की दर 4.2 प्रतिशत और मृत्यु दर 8.29 प्रतिशत रही। ये तीनों ही आंकड़े राष्ट्रीय औसत के मुकाबले काफी कम हैं, जो राज्य के बेहतर उपचार प्रबंधन को साबित करते हैं।

शिशुओं के इलाज की क्षमता बढ़ाने के लिए प्रदेश सरकार ने बेड की संख्या में भी इजाफा किया है। साल 2024-25 में उपलब्ध 1654 बिस्तरों की संख्या को बढ़ाकर अब 1770 कर दिया गया है। इन केंद्रों में वेंटिलेटर, सी-पैप, निरंतर ऑक्सीजन और फोटोथेरेपी जैसे आधुनिक उपकरण लगाए गए हैं। फैसिलिटी बेस्ड न्यूबोर्न केयर (एफबीएनसी) के तहत प्रशिक्षित डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ वैज्ञानिक पद्धतियों से बच्चों का इलाज कर रहे हैं। यहां भर्ती होने वाले कुल बच्चों में से करीब 8 प्रतिशत को वेंटिलेटर, 37 प्रतिशत को फोटोथेरेपी, 49 प्रतिशत को आवश्यकतानुसार ऑक्सीजन और 47 प्रतिशत को एंटीबायोटिक थेरेपी दी जा रही है। इसके अलावा, समय से पहले जन्मे बच्चों के जीवन की रक्षा के लिए सर्फ़ैक्टेंट और कैफीन साइट्रेट जैसी आधुनिक दवाइयां भी दी जा रही हैं।

उप जिला स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने के लिए राज्य में 200 न्यूबॉर्न स्टेबिलाइजेशन यूनिट (एनबीएसयू) काम कर रही हैं। इस साल 1 अप्रैल से 15 मई 2026 तक इन इकाइयों में 2 हजार 241 नवजात शिशुओं का सफल इलाज कर उन्हें डिस्चार्ज किया गया। यह व्यवस्था स्थानीय स्तर पर ही उच्च जोखिम वाले बच्चों को प्रारंभिक दौर में ऑक्सीजन सपोर्ट और फोटोथेरेपी देकर उनका स्वास्थ्य सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

इसी तरह ‘जीरो सेपरेशन’ यानी मां और बच्चे को एक साथ रखकर इलाज करने की आधुनिक अवधारणा पर आधारित मदर एंड न्यू बोर्न केयर यूनिट (एमएनसीयू) का विस्तार किया जा रहा है। इस व्यवस्था से समय पूर्व जन्मे और कम वजन के बच्चों को मां की देखरेख, स्तनपान और कंगारू मदर केयर की सुविधा मिलती है। वर्तमान में राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में ऐसी 23 इकाइयां काम कर रही हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य मातृ और शिशु मृत्यु दर में प्रभावी कमी लाना है।

गंभीर और कमजोर शिशुओं को पोषण देने के लिए सरकार की ओर से मातृ दुग्ध इकाइयां (सीएलएमसी) चलाई जा रही हैं। वर्ष 2025-26 के दौरान इंदौर और भोपाल में स्थित दो कॉम्प्रहेंसिव लैक्टेशन मैनेजमेंट सेंटर्स में 1,031 माताओं ने स्वेच्छा से 241.6 लीटर दूध दान किया। इस दूध को वैज्ञानिक तरीके से पाश्चुरीकृत कर 1,159 बीमार नवजात शिशुओं को कुल 282.11 लीटर सुरक्षित डोनर ह्यूमन मिल्क उपलब्ध कराया गया। यह व्यवस्था उन बच्चों के लिए जीवनदायिनी साबित हो रही है जिन्हें जन्म के समय मां का दूध नहीं मिल पाता।

डिजिटल तकनीक के स्तर पर राज्य में ‘ई-शिशु परियोजना’ चलाई जा रही है, जिससे दिसंबर 2025 से लेकर अब तक 9 हजार 889 नवजात शिशु लाभान्वित हो चुके हैं। इंदौर और उज्जैन संभाग की 16 एसएनसीयू स्पोक इकाइयों में इसके बड़े ही सकारात्मक परिणाम देखे गए हैं। इस परियोजना के लागू होने के बाद इन संभागों में औसत रेफरल दर 5 प्रतिशत से घटकर 4 प्रतिशत और शिशु मृत्यु दर 8 प्रतिशत से कम होकर 6 प्रतिशत पर आ गई है। यह डिजिटल नवाचार बच्चों के इलाज में विशेषज्ञों का समय पर मार्गदर्शन दिलाने में काफी मददगार साबित हो रहा है।

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